supreme court – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com ( A Unit OF NCR Today News Paper Group ) Wed, 21 Jan 2026 15:10:05 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://demo.theshikshanews.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-Khabariya-Logo-Samal-32x32.jpg supreme court – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com 32 32 अरावली मामला: सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनेगी कमेटी, अवैध खनन पर राज्य सरकार को सख्त निर्देश https://demo.theshikshanews.com/araavalee-maamala-supreem-kort-kee-nigaraanee-mein-banegee-kametee-avaidh-khanan-par-raajy-sarakaar-ko-sakht-nirdesh/ https://demo.theshikshanews.com/araavalee-maamala-supreem-kort-kee-nigaraanee-mein-banegee-kametee-avaidh-khanan-par-raajy-sarakaar-ko-sakht-nirdesh/#respond Wed, 21 Jan 2026 15:10:05 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6150 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi।अरावली पर्वतमाला के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक यथास्थिति को बनाए रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को अरावली में किसी भी अवैध खनन गतिविधि पर रोक सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है।
बुधवार को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक कमेटी बनाने के निर्देश दिए हैं। सीजेआई ने कहा कि कोर्ट और कड़ी निगरानी पर विचार कर रहा है। उन्होंने कहा, “हम एक कमेटी बनाएंगे, जिसमें अपने-अपने क्षेत्र के एक्सपर्ट होंगे। यह कमेटी अरावली को लेकर रिपोर्ट देगी। कमेटी कोर्ट के निर्देश और गाइडेंस में काम करेगी।”
राजस्थान के किसानों की ओर से पेश वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट को बताया कि जस्टिस ओका बेंच के 2024 के आदेशों के बावजूद खनन पट्टे दिए जा रहे हैं और पेड़ काटे जा रहे हैं। उन्होंने इस पर रोक की मांग की। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चिंता जताई और कहा कि अवैध खनन को रोकना होगा। यह एक अपराध है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अधिकारियों से कहा कि आपको अपनी मशीनरी को काम में लाना होगा, क्योंकि अवैध खनन के विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार से कहा कि वह सुनिश्चित करें कि कोई गैरकानूनी खनन न हो। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और माइनिंग एक्सपर्ट्स के नामों को लेकर सुझाव मांगे।
सुनवाई के दौरान बेंच ने स्पष्ट किया कि ‘जंगलों’ और ‘अरावली’ को परिभाषित करने के सवाल की जांच अलग से की जाएगी। कोर्ट ने कहा कि दोनों मुद्दे अलग-अलग चिंताएं उठाते हैं और उन पर अलग से विचार करने की जरूरत होगी। जब एमिकस अपना नोट जमा कर देंगे, तब इस मामले पर सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट ने एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर को अरावली की परिभाषा पर एक विस्तृत नोट फाइल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है।
पिछली सुनवाई में, सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव से जुड़े अपने पिछले निर्देशों को रोक दिया था।

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समाचारपत्र ‘पंजाब केसरी’ के प्रिंटिंग प्रेस निर्बाध रूप से काम करते रहेंगे : न्यायालय https://demo.theshikshanews.com/samaachaarapatr-panjaab-kesaree-ke-printing-pres-nirbaadh-roop-se-kaam-karate-rahenge-nyaayaalay/ https://demo.theshikshanews.com/samaachaarapatr-panjaab-kesaree-ke-printing-pres-nirbaadh-roop-se-kaam-karate-rahenge-nyaayaalay/#respond Tue, 20 Jan 2026 16:42:38 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6147 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को कहा कि ‘‘समाचारपत्रों को रोका नहीं जा सकता’’ और पंजाब सरकार तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया कि वे प्रदेश में ‘पंजाब केसरी’ अख़बार के प्रकाशन के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाएं।
न्यायालय ने मौखिक रूप से उल्लेख किए जाने के बाद समाचारपत्र समूह की याचिका पर तत्काल सुनवाई की और आदेश दिया कि हिंदी दैनिक के प्रिंटिंग प्रेस निर्बाध रूप से काम करते रहेंगे, भले ही पंजाब राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कथित उल्लंघनों के कारण बिजली आपूर्ति बंद करने का निर्णय लिया हो।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने कहा कि राज्य की कार्रवाई को चुनौती देने वाले समाचार पत्र समूह द्वारा दायर याचिका पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद भी उसका अंतरिम आदेश एक सप्ताह तक प्रभावी रहेगा।
⁠पीठ ने अखबार समूह की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, ‘‘दोनों पक्षों के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना और मामले के गुण दोष पर कोई राय व्यक्त किए बिना, यह निर्देश दिया जाता है कि पंजाब केसरी के प्रिंटिंग प्रेस निर्बाध रूप से काम करते रहेंगे और अन्य वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों, जैसे होटल आदि के संबंध में यथास्थिति बरकरार रहेगी।’’
संक्षिप्त सुनवाई के बाद पीठ ने आदेश दिया, ‘यह अंतरिम व्यवस्था उच्च न्यायालय का फैसला आने तक और पीड़ित पक्ष को उचित मंच पर जाने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय देने के लिए की गई है।’
मामले की सुनवाई की शुरुआत में, समाचार पत्र समूह की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने स्थिति को एक ‘असाधारण मामला’ बताया और आरोप लगाया कि पंजाब सरकार की आलोचना करने वाले लेखों के प्रकाशन के बाद राज्य ने समन्वित तरीके से उत्पीड़न अभियान चलाया।
रोहतगी ने कहा कि लेख के प्रकाशन के बाद, प्रबंधन के खिलाफ विभिन्न दंडात्मक कार्रवाइयां शुरू की गईं, जिसमें बिजली आपूर्ति बंद करना, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा प्रेस को नोटिस जारी करना, अखबार मालिकों द्वारा संचालित होटलों को बंद करना और प्राथमिकी दर्ज करना आदि शामिल हैं।
उन्होंने कहा, ‘यह सब दो दिनों के भीतर हुआ, क्योंकि हमने पंजाब की मौजूदा सरकार के लिए प्रतिकूल लेख प्रकाशित किए थे।’
पिछले कुछ दशकों से कार्यरत प्रेस को कथित जल प्रदूषण के मुद्दे पर तत्काल बंद करने का निर्देश दिया गया है।
उन्होंने बताया कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई की और फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि, अंतरिम राहत नहीं दी गई है।
राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने बताया कि राज्य सरकार ने सभी कदम कानून के अनुरूप उठाए। उन्होंने कहा कि उच्च न्यायालय ने इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया है और आज या कल तक फैसला आने की उम्मीद है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “यह मामला निश्चित रूप से प्रतीक्षा कर सकता है। प्रदूषण नियंत्रण कानून के तहत उठाए गए कदम बिल्कुल नियमों के अनुसार हैं। लोग इसे कुछ और ही रूप दे रहे हैं। जो भी कार्रवाई आवश्यक थी, वह पहले ही की जा चुकी है; हम आगे कोई कार्रवाई नहीं करने वाले हैं।”
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं। अखबारों को रोका नहीं जा सकता’’ और अंतरिम राहत प्रदान की।

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वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई टली, अब 29 को होगा फैसला https://demo.theshikshanews.com/vaangachuk-kee-hiraasat-ko-chunautee-dene-vaalee-yaachika-par-sunavaee-talee-ab-29-ko-hoga-phaisala/ https://demo.theshikshanews.com/vaangachuk-kee-hiraasat-ko-chunautee-dene-vaalee-yaachika-par-sunavaee-talee-ab-29-ko-hoga-phaisala/#respond Wed, 14 Jan 2026 16:59:33 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6120 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को जेल में बंद जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की हिरासत के मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। न्यायालय ने वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई 29 जनवरी 2026 तक के लिए टाल दी है, जिसमें उन्होंने अपने पति के खिलाफ लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) को चुनौती दी है। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली तारीख तय की है।
गीतांजलि ने अपनी याचिका में दलील दी है कि उनके पति की हिरासत पूरी तरह से अवैध और मनमानी है। उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि अधिकारियों ने हिरासत का आदेश जारी करते समय अपने विवेक का सही इस्तेमाल नहीं किया और केवल अप्रासंगिक सामग्री को आधार बनाया। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि लेह में वांगचुक द्वारा दिए गए भाषणों का उद्देश्य हिंसा भड़काना नहीं, बल्कि लोगों को शांत करना था। गीतांजलि का आरोप है कि प्रशासन तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहा है ताकि एक सामाजिक कार्यकर्ता को अपराधी के रूप में चित्रित किया जा सके। सोनम वांगचुक को पिछले साल 26 सितंबर 2025 को हिरासत में लिया गया था। यह कार्रवाई लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर लेह में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद की गई थी। उस हिंसा में चार लोगों की जान चली गई थी और लगभग 90 लोग घायल हुए थे। सरकार और लेह के जिलाधिकारी का दावा है कि वांगचुक ने हिंसा को भड़काने में मुख्य भूमिका निभाई थी और उनकी गतिविधियां राज्य की सुरक्षा व सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक थीं। वहीं, गीतांजलि ने अदालत में कहा कि वांगचुक को उनकी हिरासत के पूर्ण आधार की जानकारी नहीं दी गई और न ही उन्हें उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखने का मौका मिला। उन्होंने स्पष्ट किया कि 24 सितंबर को लेह में हुई दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा के लिए उनके पति के बयानों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर, जिलाधिकारी ने हलफनामे के जरिए इन आरोपों का खंडन किया है कि वांगचुक के साथ कोई अनुचित व्यवहार किया जा रहा है। अब सभी की निगाहें 29 जनवरी को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत इस संवेदनशील मामले पर विस्तार से विचार करेगी।

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अफसरों की जांच के लिए पूर्व मंजूरी मामले पर आया खंडित फैसला https://demo.theshikshanews.com/aphasaron-kee-jaanch-ke-lie-poorv-manjooree-maamale-par-aaya-khandit-phaisala/ https://demo.theshikshanews.com/aphasaron-kee-jaanch-ke-lie-poorv-manjooree-maamale-par-aaya-khandit-phaisala/#respond Tue, 13 Jan 2026 15:33:39 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6118 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। सुप्रीम कोट ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार मामलों की जांच शुरू करने से पहले अनुमति लेने से संबंधित, भ्रष्टाचार रोधी कानून 2018 की धारा की संवैधानिक वैधता पर मंगलवार को खंडित निर्णय सुनाया। इस मुद्दे पर फैसला सुनाने वाली पीठ में शामिल जजों की अलग-अलग राय होने के चलते अब इस मामले को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष रखने का निर्देश दिया है ताकि इस मुद्दे पर फैसला करने के लिए बड़ी पीठ गठित की जा सके। केंद्र ने जुलाई 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में संशोधन करते हुए धारा 17ए का प्रावधान शामिल किया था। इसके अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों/आदेशों के लिए किसी भी लोकसेवक के खिलाफ ‘जांच या पूछताछ’ नहीं की जा सकती है। याचिकाकर्ता संगठन की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुनवाई के दौरान पीठ से कहा था कि ये प्रावधान भ्रष्टाचार विरोधी कानून को कमजोर करते हैं क्योंकि सरकार, जो सक्षम प्राधिकार है, से आमतौर पर मंजूरी नहीं मिलती है।
जस्टिस नागरत्ना का फैसला
धारा 17ए असंवैधानिक, इसे खत्म किया जाना चाहिए जस्टिस नागरत्ना ने अलग लिखे अपने फैसले में कहा कि किसी अधिकारी के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए पूर्व मंजूरी की जरूरत भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के मकसद के खिलाफ है क्योंकि यह जांच को रोकती है और भ्रष्ट अधिकारियों को बचाती है। उन्होंने कहा कि धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों में किसी भी लोक सेवक के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए कोई पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। पूर्व मंजूरी की जरूरत कानून के उद्देश्य के विपरीत है।
जस्टिस विश्वनाथन का फैसला
धारा 17ए वैध, ईमानदार अफसरों के हाथ मजबूत होंगे जस्टिस विश्वनाथन ने अपने फैसले में कहा कि पीसी एक्ट की धारा 17 खत्म करना बच्चे को नहाने के पानी के साथ बाहर फेंकने जैसा होगा और इलाज बीमारी से भी बदतर होगा। उन्होंने कहा कि धारा 17ए संवैधानिक रूप से वैध है, इस शर्त के अधीन कि मंजूरी का फैसला लोकपाल या राज्य के लोकायुक्त द्वारा किया जाना चाहिए। जस्टिस विश्वनाथन के कहा कि कानून का यह प्रावधान ईमानदार अधिकारियों के हाथों को मजबूत करेगा, लेकिन यह भी सुनिश्चित करेगा कि भ्रष्ट लोगों को सजा मिले। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान गारंटी देगा कि प्रशासनिक तंत्र देश की सेवा के लिए सबसे अच्छी प्रतिभा को आकर्षित करे।

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विवादित पोस्ट मामला : नेहा सिंह राठौर को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत https://demo.theshikshanews.com/vivaadit-post-maamala-neha-sinh-raathaur-ko-supreem-kort-se-antarim-raahat/ https://demo.theshikshanews.com/vivaadit-post-maamala-neha-sinh-raathaur-ko-supreem-kort-se-antarim-raahat/#respond Wed, 07 Jan 2026 13:25:07 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6081 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। लोक गायिका नेहा सिंह राठौर (Neha Singh Rathore) को पहलगाम आतंकी हमले पर कथित विवादित सोशल मीडिया पोस्ट (Controversial post case) के मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से बड़ी राहत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने नेहा की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह मामला अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जुड़ा है, जिसमें कई पर्यटकों की मौत हो गई थी।
हमले के बाद नेहा सिंह राठौर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किए थे, जिनमें सरकार और प्रधानमंत्री की आलोचना की गई थी। पोस्ट को आपत्तिजनक बताते हुए लखनऊ के हजरतगंज थाने में शिकायतकर्ता अभय प्रताप सिंह की ओर से एफआईआर दर्ज कराई गई।
आरोप है कि इन पोस्ट से देश में नफरत फैलाने और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई। इस मामले में नेहा सिंह राठौर ने पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की थी, लेकिन दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और शिकायतकर्ता अभय प्रताप सिंह को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने अंतरिम राहत देते हुए नेहा की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी, लेकिन स्पष्ट निर्देश दिया कि वह 19 जनवरी को पुलिस जांच में शामिल होंगी और पूछताछ में पूरा सहयोग करेंगी। अगर वह जांच में सहयोग नहीं करतीं, तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच आगे बढ़ेगी और नेहा को निर्देशों का पालन करना होगा।
नेहा सिंह राठौर सोशल मीडिया पर अपनी राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणियों के लिए जानी जाती हैं। उनके गाने और पोस्ट अक्सर चर्चा में रहते हैं। इस मामले में पहले भी वे जांच के दायरे में थीं, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट की अंतरिम रोक से उन्हें तत्काल राहत मिल गई है। हालांकि, मामला अभी लंबित है और आगे की सुनवाई में अंतिम फैसला आएगा।

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न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने आरोपों की जांच के लिए जांच समिति गठित किए जाने की आलोचना की https://demo.theshikshanews.com/nyaayamoorti-yashavant-varma-ne-aaropon-kee-jaanch-ke-lie-jaanch-samiti-gathit-kie-jaane-kee-aalochana-kee/ https://demo.theshikshanews.com/nyaayamoorti-yashavant-varma-ne-aaropon-kee-jaanch-ke-lie-jaanch-samiti-gathit-kie-jaane-kee-aalochana-kee/#respond Wed, 07 Jan 2026 12:45:03 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6079 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi।  इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति का गठन किए जाने का बुधवार को उच्चतम न्यायालय में विरोध किया।

न्यायमूर्ति वर्मा की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने की और उन्होंने न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और सतीश चंद्र शर्मा की पीठ को न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के प्रावधानों का हवाला देते हुए बताया कि यदि महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा और राज्यसभा में एक ही दिन एक साथ पेश किए जाते हैं तो जांच समिति का गठन दोनों सदनों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि मौजूदा मामले में, राज्यसभा में प्रस्ताव रद्द कर दिया गया था और लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति का गठन किया था जो कानून की दृष्टि से ‘अस्तित्वहीन’ है।
⁠रोहतगी ने राज्यसभा के उपसभापति द्वारा उस प्रस्ताव को खारिज किए जाने के फैसले की भी आलोचना की, जिसे पहले उच्च सदन के अध्यक्ष ने स्वीकार कर लिया था।
रोहतगी ने कहा कि सवाल यह है कि क्या लोकसभा अध्यक्ष एकतरफा रूप से जांच समिति का गठन कर सकते हैं, जबकि दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव पेश किए गए थे, लेकिन उन्हें केवल एक सदन में ही स्वीकार किया गया था।
वरिष्ठ वकील ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की धारा 3(2) के तहत लोकसभा अध्यक्ष द्वारा तीन सदस्यीय समिति के गठन पर सवाल उठाया और यह तर्क दिया कि यह संविधान के अनुच्छेद 124(5) के तहत अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन करता है।
रोहतगी ने कहा कि किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद को अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का सख्ती से पालन करना चाहिए, जिसके लिए लोकसभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्यसभा के 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव की आवश्यकता होती है।
एक बार ऐसा प्रस्ताव स्वीकार हो जाने पर एक समिति का गठन किया जाएगा जो एक प्रकार से विभागीय कार्यवाही के समान होगी।
पीठ का ध्यान आकर्षित करते हुए रोहतगी ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन यानी 21 जुलाई 2025 को पेश किए गए थे।
प्रावधानों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्तावों के नोटिस दिए जाते हैं, तो कोई समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न हो जाए।
ऐसी स्थिति में अधिनियम में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा एक संयुक्त समिति के गठन का प्रावधान है।
रोहतगी ने कहा, ‘‘मौजूदा मामले में एक प्रस्ताव खारिज कर दिया गया। इसलिए, उसके बाद गठित समिति कानून की दृष्टि से अमान्य है।’’
हालांकि, पीठ ने सवाल उठाया कि क्या एक सदन में किसी प्रस्ताव की अस्वीकृति दूसरे सदन में शुरू की गई कार्यवाही को स्वतः ही अमान्य कर देगी।
लोकसभा द्वारा दायर हलफनामे का हवाला देते हुए रोहतगी ने कहा कि राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त को प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, जबकि लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त को समिति का गठन किया था।
पीठ ने कहा कि अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा गया है कि यदि एक सदन किसी प्रस्ताव को अस्वीकार कर देता है, तो दूसरा सदन कार्यवाही करने से वंचित हो जाएगा।
न्यायमूर्ति दत्ता ने पूछा, ‘राज्यसभा की ओर से प्रस्ताव को अस्वीकार किए जाने की स्थिति में लोकसभा द्वारा समिति नियुक्त करने के प्रावधान के तहत रोक कहां है?’ मामले में सुनवाई फिलहाल जारी है।

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सुप्रीम कोर्ट से जेएसएससी सीजीएल परीक्षा से जुड़ी याचिका खारिज, हाईकोर्ट के फैसले को माना सही https://demo.theshikshanews.com/supreem-kort-se-jeesesasee-seejeeel-pareeksha-se-judee-yaachika-khaarij-haeekort-ke-phaisale-ko-maana-sahee/ https://demo.theshikshanews.com/supreem-kort-se-jeesesasee-seejeeel-pareeksha-se-judee-yaachika-khaarij-haeekort-ke-phaisale-ko-maana-sahee/#respond Mon, 05 Jan 2026 11:39:44 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6060 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi/Ranchi। जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें झारखंड हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से राज्य सरकार और परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सुनाया। कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है। इसके साथ ही अपीलकर्ताओं की याचिका को खारिज कर दिया गया।
ज्ञातव्य है कि इससे पहले 3 दिसंबर को झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एसएससी-सीजीएल परीक्षा मामले में फैसला सुनाया था। हाईकोर्ट ने 10 छात्रों के परिणाम पर रोक लगाते हुए, शेष सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया जारी रखने का आदेश दिया था।
हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट कुछ छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे न्याय की अंतिम उम्मीद लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं और उन्हें वहां से निष्पक्ष व न्यायसंगत निर्णय की अपेक्षा है। इसी बीच झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) ने सफल अभ्यर्थियों की मेरिट लिस्ट जारी कर दी और राज्य सरकार ने नियुक्ति पत्र भी सौंप दिए। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सफल अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने पक्ष रखा था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब एसएससी-सीजीएल नियुक्ति प्रक्रिया पर लगा असमंजस समाप्त हो गया है और नियुक्त अभ्यर्थियों के भविष्य का रास्ता साफ हो गया है।

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वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट के आदेशा पर डेल्सी रोड्रिग्ज ने कार्यवाहक राष्ट्रपति का कार्यभार संभाला https://demo.theshikshanews.com/venejuela-ke-supreem-kort-ke-aadesha-par-delsee-rodrigj-ne-kaaryavaahak-raashtrapati-ka-kaaryabhaar-sambhaala/ https://demo.theshikshanews.com/venejuela-ke-supreem-kort-ke-aadesha-par-delsee-rodrigj-ne-kaaryavaahak-raashtrapati-ka-kaaryabhaar-sambhaala/#respond Mon, 05 Jan 2026 04:23:36 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6058 NCR TODAY. Khabariya. Webvarta. karkas। वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार शनिवार देर रात उप राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्ज ने तत्काल प्रभाव से कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाल लिया है। यह आदेश अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन ‘एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़े जाने के बाद आया। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश कैरिस्लिया रोड्रिग्ज ने सरकारी टीवी चैनल वीटीवी पर प्रसारित एक बयान में कहा था, “राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण से उत्पन्न असाधारण स्थिति को देखते हुए यह आदेश दिया जाता है कि गणतंत्र की कार्यकारी उपराष्ट्रपति कार्यवाहक क्षमता में राष्ट्रपति पद की सभी शक्तियों, कर्तव्यों और कार्यों को संभालें। यह निर्णय प्रशासनिक निरंतरता और राष्ट्र की व्यापक रक्षा सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है।”
वेनेजुएला का संविधान अनुच्छेद 233 और 234 के तहत ऐसी स्थितियों का प्रावधान करता है, जो राष्ट्रपति की अस्थायी या पूर्ण अनुपस्थिति की स्थिति में उपराष्ट्रपति को पदभार संभालने की अनुमति देते हैं।
श्री मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को हिरासत में लिए जाने के कुछ ही घंटों बाद, जस्टिस रोड्रिग्ज ने मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राष्ट्रीय रक्षा परिषद के सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने मादुरो दंपति की ‘तत्काल रिहाई’ की मांग की और अमेरिकी ऑपरेशन की निंदा करते हुए इसे ‘अंतरराष्ट्रीय कानून और वेनेजुएला की संप्रभुता का खुला उल्लंघन’ बताया।
जस्टिस रोड्रिग्ज ने इस बात पर जोर दिया कि श्री मादुरो ही वेनेजुएला के एकमात्र वैध राष्ट्रपति हैं। उन्होंने वेनेजुएला के लोगों से इस ऑपरेशन का विरोध करने का आग्रह किया और मध्य अमेरिकी देशों की सरकारों से इसकी निंदा करने की अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने वेनेजुएला के लोगों और क्षेत्र के खिलाफ अमेरिका द्वारा किए गए गंभीर सैन्य हमले और श्री मादुरो और उनकी पत्नी के अपहरण की कड़ी निंदा की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अमेरिकी कार्रवाई वेनेजुएला के संविधान, अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन है, जिसका उद्देश्य वेनेजुएला के रणनीतिक संसाधनों पर कब्जा करना है।
उल्लेखनीय है कि श्री मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को शनिवार सुबह वेनेजुएला के खिलाफ एक बड़े अमेरिकी सैन्य अभियान में पकड़ लिया गया था। इसी बीच अमेरिकी स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, श्री मादुरो और उनकी पत्नी को न्यूयॉर्क में एक सैन्य अड्डे पर पहुंचा दिया गया है।
दूसरी ओर रविवार को अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी ने वेनेजुएला के खिलाफ चलाए गए अमेरिकी अभियान को ‘युद्ध की कार्रवाई’ और ‘अंतरराष्ट्रीय एवं संघीय कानून का उल्लंघन’ बताया।
श्री ममदानी ने कहा कि सत्ता परिवर्तन की यह खुलेआम कोशिश न केवल विदेशों में रह रहे अमेरिकी नागरिकों को प्रभावित करती है, बल्कि इसका सीधा असर न्यूयॉर्क निवासियों पर भी पड़ता है, जिनमें वेनेजुएला के हजारों नागरिक भी शामिल हैं ।
इससे पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) ने शनिवार को घोषणा की कि वह वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिकी अभियान पर सोमवार को एक आपातकालीन बैठक आयोजित करेगी।

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सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में राजस्व गांवों का नाम व्यक्तियों के नाम पर रखने वाली अधिसूचना रद्द की https://demo.theshikshanews.com/uchchatam-nyaayaalay-ne-raajasthaan-mein-raajasv-gaanvon-ka-naam-vyaktiyon-ke-naam-par-rakhane-vaalee-adhisoochana-radd-kee/ https://demo.theshikshanews.com/uchchatam-nyaayaalay-ne-raajasthaan-mein-raajasv-gaanvon-ka-naam-vyaktiyon-ke-naam-par-rakhane-vaalee-adhisoochana-radd-kee/#respond Wed, 24 Dec 2025 14:16:13 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6048 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के राजस्व गांवों का नाम निजी लोगों के नाम पर रखने वाली अधिसूचना रद्द कर दी है। न्यायालय ने कहा कि राजस्थान सरकार ने नए बनाए गए राजस्व गांवों का नाम निजी लोगों के नाम पर रखकर अपनी ही नीति का उल्लंघन किया है और राजस्थान उच्च न्यायालय के एकलपीठ के न्यायमूर्ति के अधिसूचना रद्द करने के आदेश को बहाल कर दिया है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने बाड़मेर जिले के सोहदा गांव के निवासियों की याचिका को स्वीकार कर राजस्थान उच्च न्यायालय के खंडपीठ के फैसले को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने राजस्व गांव ‘अमरगढ़’ और ‘सगतसर’ बनाने को सही ठहराया था।
यह विवाद 31 दिसंबर, 2020 को राज्य सरकार द्वारा राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम 1956 के सेक्शन 16 के तहत जारी किए गए एक अधिसूचना से उत्पन्न हुआ, जिसमें कई नए राजस्व गांव बनाए गए थे। इनमें बाड़मेर जिले के सोहदा गांव में मेघवालों की ढाणी से अलग किए गए अमरगढ़ और सगतसर शामिल थे।
अधिसूचना जारी होने से पहले, तहसीलदार ने सत्यापित किया था कि नए राजस्व गांव बनाने के लिए सभी कानूनी ज़रूरतें पूरी हो गई हैं और उनके बनने को लेकर कोई विवाद नहीं है। प्रस्तावित गांवों के लिए ज़मीन दान करने की मंज़ूरी देने वाले लोगों ने भी शपथपत्र दिए थे।
2025 में ग्राम पंचायतों के पुर्नगठन के लिए बाद गांववालों ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि ‘अमरगढ़’ और ‘सगतसर’ नाम निजी लोगों, यानी अमरराम और सगत सिंह के नामों से लिए गए हैं। गांववालों ने राजस्थान उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया और 2020 की अधिसूचना को चुनौती दी। न्यायालय के एकल न्यायाधीश ने 11 जुलाई, 2025 को अपने आदेश में कहा कि गांवों का नामकरण राज्य सरकार के 20 अगस्त, 2009 के परिपत्र का उल्लंघन है, जो किसी भी व्यक्ति, धर्म, जाति या उपजाति के नाम पर राजस्व गांव का नाम रखने पर रोक लगाता है। न्यायाधीश ने पहले के उदाहरणों का हवाला देते हुए अमरगढ़ और सगतसर के बारे में जारी अधिसूचना को रद्द कर दिया।
हालांकि, उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने पांच अगस्त, 2025 के अपने फैसले में एकल न्यायाधीश के आदेश को पलट दिया और कहा कि पहले के फैसलों का फायदा नहीं दिया जा सकता क्योंकि गांवों को बनाने की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी थी।
उच्चतम न्यायालय ने अपील को मंज़ूरी देते हुए माना कि खंडपीठ ने 2009 के परिपत्र के अनुबंध को नज़रअंदाज़ करके गलती की थी।
न्यायालय ने कहा कि परिपत्र का खंड चार साफ कहता है कि किसी राजस्व गांव का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर आधारित नहीं होना चाहिए, और यह नीति सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए बनाई गई थी।
उच्चतम न्यायालय ने खंडपीठ की दलील को खारिज करते हुए कहा कि एक लंबित सूची उसकी वरीयता के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए और राज्य इस आधार पर किसी गैर-कानूनी कार्रवाई को सही नहीं ठहरा सकता कि मामला खत्म हो गया है।
उच्चतम न्यायालय ने पांच अगस्त, 2025 के खंडपीठ के फैसले को रद्द कर दिया और 11 जुलाई, 2025 के एकल न्यायाधीश के आदेश को बहाल कर दिया।

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वीआईपी दर्शन पर सुप्रिम आदेश, निर्णय केंद्र करे https://demo.theshikshanews.com/veeaeepee-darshan-par-suprim-aadesh-nirnay-kendr-kare/ https://demo.theshikshanews.com/veeaeepee-darshan-par-suprim-aadesh-nirnay-kendr-kare/#respond Sat, 20 Dec 2025 05:25:17 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6041 अशोक मधुप/वरिष्ठ पत्रकार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मंदिरों में ‘वीआईपी दर्शन’ सुविधा को चुनौती देने वाली याचिका भले ही खारिज कर दी, किंतु इस याचिका पर कोर्ट द्वारा कही गई बातों की गूंज दूर तक जाएगी। यह गूंज केंद्र सरकार को विवश करेगी कि वह मंदिरों में हाने वाले वीवीआईपी दर्शन पर रोक लगाने वाला निर्णय लें । कार्ट की ये गूंज आने वाले समय में मंदिरों के वीवीआईपी दर्शन कर रोक लगाने का रास्ता प्रशस्त करेगी।
मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है। इस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है। यह याचिका मंदिरों की तरफ से वसूले जाने वाले वीआईपी दर्शन शुल्क को समाप्त करने की मांग कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, ‘हालांकि हमारी राय है कि मंदिरों में प्रवेश के संबंध में कोई विशेष व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन हमें नहीं लगता कि यह अनुच्छेद 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का उपयुक्त मामला है।’ यह आदेश में दर्ज किया गया लेकिन मामला सरकार के विचार के लिए छोड़ दिया गया।मुख्य न्यायधीश खन्ना ने कहा कि यह मामला कानून-व्यवस्था का प्रतीत होता है और याचिका इस पहलू पर होनी चाहिए थी। बेंच ने कहा, ‘हम स्पष्ट करते हैं कि याचिका खारिज होने से संबंधित अधिकारियों को जरूरत के हिसाब से कार्रवाई करने से नहीं रोका जाएगा।
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, ‘आज 12 ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ इस प्रैक्टिस को फॉलो करते हैं। ये मनमाना और भेदभाव वाला है। यहां तक कि गृह मंत्रालय ने भी आंध्र प्रदेश से इसकी समीक्षा करने को कहा है। चूंकि, भारत में 60 प्रतिशत पर्यटन धार्मिक है, इसलिए ये भगदड़ की प्रमुख वजह भी है।’ सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका विजय किशोर गोस्वामी ने डाली थी। उन्होंने मंदिरों में अतिरिक्त शुल्क लेकर ‘वीआईपी दर्शन’ के चलन को आर्टिकल 14 के तहत समानता के अधिकार और आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया। उन्होंने दलील दी कि जो लोग इस तरह का शुल्क अदा करने में असमर्थ हैं, ये उनके खिलाफ भेदभाव है। याचिका में जोर देकर कहा गया था कि कई मंदिर 400 से 500 रुपये में लोगों के लिए विशेष दर्शन की व्यवस्था करते हैं। इससे आम श्रद्धालु और खासकर महिलाएं, स्पेशली एबल्ड लोग और सीनियर सिटिजंस को दर्शन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह मामला देश भर के मंदिरों में आम लोगों और वीआईपी के बीच भेदभाव के मुद्दे को उठाता है। वीआईपी दर्शन की सुविधा से आम लोगों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है, जबकि वीआईपी आसानी से दर्शन कर लेते हैं।
ये एकजगह नही है,श्रृद्धालू को इस समस्या से सभी जगह रूबरू होना पड़ता है। जगह –जगह मंदिरों में इस समस्या का सामना करना पड़ा है। लगभग 40 साल पहले हम कोलकत्ता गए। कालिका जी मंदिर में हम श्रृद्धालुओं की लाइन में लगे थे कि हमारे एक साथी ने देखा और हमें इशारा कर अपने पास बुला लिया। यहां पुजारी पांच रूपया प्रति व्यक्ति लेकर सीधे दर्शन करा रहे थे। अभी वेट द्वारिका जाना हुआ। हम परिवार के छह सदस्य थे। एक पंडित जी ने हमसे पांच सौ रूपये लिए।अलग लाइन से हमें आराम से दर्शन कराए। भीड़− भाड़ भी बची।वैसे दर्शन में दो से तीन घंटे लगते पांच सौ रूपये में आधा घंटा में दर्शन कर मंदिर से बाहर आ गए। करीब दस साल पहले हम गुजरात में अम्बा जी गए थे। दर्शन की लाइन में लगे थे कि कर्मचारियों ने यह कह कर हमके रोक दिया कि दर्शन का समय समाप्त हो गया, जबकि कुछ अन्य को लगातार प्रदेश दिया जा रहा। किसी तरह हम अन्यों वाली पंक्ति में शामिल हुए। तब दर्शन हुए। दर्शन भी बड़े आराम से हुए। काफी समय हम मंदिर में रूके , जबकि ऐसा पहले संभव नही था। इस तरह का भेदभाव हमें कई जगह देखने को मिला। उज्जैन में तो आप पंडित को पांच सौ के आसपास रूपये दीजिए।वह मंदिर के गर्भ गृह में ले जाकर पूजन अर्चन कराते हैं। जो ये रकम नही देते वे गर्भगृह के बाहर ही दूर से दर्शन कर तृप्त हो जाते हैं।ओंकारेश्वर में तो पंडित जी पूजा भी आराम से और श्रद्धालुओं की पंक्ति से अलग लेकर कराते हैं। मथुरा जी के बांके बिहारी मंदिर में सुपरिम आदेश से यह व्यवस्था रूकी है, अन्यथा लगभग सभी मंदिरों की हालत ऐसी ही है।
सुपरिम कोर्ट ने याचिका तो खारिज कर दी, किंतु इस वीआईपी दर्शन पर रोक वाली गेंद केंद्र सरकार के पाले में यह कह कर डाल दी । बेंच ने कहाकि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है। इस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है।
सुपरिम कोर्ट का यह निर्देश अब केंद्र सरकार को विवश करेगा कि मंदिरों में आम आदमी के साथ हो रहे भेदभाव को रोके और बांके बिहारी मंदिर की तरह पैसा लेकर कराए जा रहे वीआईपी दर्शन की व्यवस्था खत्म करे। व्यवस्था अयोध्या जी के श्रीराम मंदिर जैसी हो, जहां श्रद्धालू बिना भेदभाव आराम से 25−30 मिनट में दर्शन कर बाहर आ सके।

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लावारिस कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई टली, 7 जनवरी को अगला फैसला https://demo.theshikshanews.com/laavaaris-kutton-par-supreem-kort-kee-sunavaee-talee-7-janavaree-ko-agala-phaisala/ https://demo.theshikshanews.com/laavaaris-kutton-par-supreem-kort-kee-sunavaee-talee-7-janavaree-ko-agala-phaisala/#respond Thu, 18 Dec 2025 13:54:47 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6026 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। लावारिस कुत्तों की देखभाल और उनसे जुड़ी सुरक्षा चिंताओं पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही अहम सुनवाई फिलहाल टाल दी गई है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी 2026 को होगी। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सभी आपत्तियों और दलीलों पर उसी दिन विस्तार से विचार किया जाएगा।
यह मामला गुरुवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि जिस तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ को इस मामले की सुनवाई करनी थी, वह अब नहीं बैठ रही है, इसलिए सुनवाई को आगे के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने आरोप लगाया कि दिल्ली नगर निगम ने लावारिस कुत्तों के प्रबंधन को लेकर ऐसे नियम बना दिए हैं, जो मौजूदा कानूनों और वैधानिक प्रावधानों के खिलाफ हैं। उन्होंने आशंका जताई कि दिसंबर में ही इन नियमों को लागू कर दिया जाएगा और कुत्तों को हटाया जाएगा, जबकि उनके लिए पर्याप्त शेल्टर होम की व्यवस्था नहीं है। सिब्बल ने इसे बेहद अमानवीय करार दिया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि यदि नियम लागू होते हैं, तो अदालत बाद में इस पर विचार करेगी।
वहीं, न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगली सुनवाई में एक वीडियो दिखाया जाएगा और यह सवाल उठाया जाएगा कि आखिर मानवता क्या होती है। इस पर कपिल सिब्बल ने भी कहा कि याचिकाकर्ता पक्ष जमीनी हालात दिखाने के लिए वीडियो प्रस्तुत करेगा।
अदालत ने साफ किया कि लावारिस कुत्तों के प्रबंधन से जुड़े सभी विवादों और आपत्तियों पर 7 जनवरी 2026 को ही विस्तार से सुनवाई होगी।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान में ली गई उस कार्यवाही का हिस्सा है, जो 28 जुलाई को दिल्ली में लावारिस कुत्तों के काटने की घटनाओं, खासकर बच्चों में रेबीज के मामलों से जुड़ी मीडिया रिपोर्टों के बाद शुरू हुई थी। इससे पहले 7 नवंबर को अदालत ने स्कूलों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और खेल परिसरों जैसे संवेदनशील स्थानों पर कुत्तों के काटने की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि पर गहरी चिंता जताई थी।
अपने पिछले आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में स्कूलों, अस्पतालों, बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और स्टेडियमों को लावारिस कुत्तों से मुक्त करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही अदालत ने हाईवे और सड़कों से गाय, बैल और अन्य पशुओं को हटाने का भी आदेश दिया था। कोर्ट ने यह भी कहा था कि हर हाईवे पर 24 घंटे निगरानी टीमें और हेल्पलाइन नंबर तैनात किए जाएं।

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दिल्ली में अब केवल बीएस-4 और उससे ऊपर के मानक वाले वाहन ही चल सकेंगे: सुप्रीम कोर्ट https://demo.theshikshanews.com/dillee-mein-ab-keval-beees-4-aur-usase-oopar-ke-maanak-vaale-vaahan-hee-chal-sakenge-supreem-kort/ https://demo.theshikshanews.com/dillee-mein-ab-keval-beees-4-aur-usase-oopar-ke-maanak-vaale-vaahan-hee-chal-sakenge-supreem-kort/#respond Wed, 17 Dec 2025 16:42:48 +0000 http://www.khabariya.com/?p=6019 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को स्पष्ट किया कि दिल्ली में केवल ऐसे वाहनों को ही चलने की अनुमति दी जाएगी जो बीएस-4 उत्सर्जन मानक या उससे ऊपर की श्रेणी के हैं।
न्यायालय के इस नए स्पष्टीकरण के बाद अब अधिकारी उन पुराने वाहनों के खिलाफ कार्रवाई कर सकेंगे जो बीएस-चार मानकों को पूरा नहीं करते हैं। वहीं बीएस-4 या नये वाहनों को उनकी समय सीमा पूरी होने के बावजूद चलाने की अनुमति है।
न्यायालय का यह नवीनतम आदेश, उसके गत 12 अगस्त के उस पिछले आदेश में संशोधन करता है, जिसमें राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में दस साल से अधिक पुराने डीजल वाहनों और पंद्रह साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों के खिलाफ कार्रवाई करने पर रोक लगा दी गई थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पांचोली की पीठ ने दिल्ली सरकार की उस याचिका पर यह स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें शहर में बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखते हुए पुराने वाहनों पर कार्रवाई की अनुमति मांगी गई थी।
दिल्ली सरकार की ओर से पेश अपर सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायालय से आग्रह किया कि 12 अगस्त के आदेश में संशोधन किया जाए ताकि बीएस-3 तक के उत्सर्जन मानकों वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। उन्होंने दलील दी कि पुराने वाहनों के उत्सर्जन मानक बहुत खराब हैं और वे प्रदूषण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। वायु प्रदूषण मामले में न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने भी इस दलील का समर्थन किया।
पीठ ने दलीलों को दर्ज करते हुए निर्देश दिया कि 12 अगस्त के आदेश को उस सीमा तक संशोधित किया जाता है कि उन वाहन मालिकों के खिलाफ कोई कठोर कदम नहीं उठाया जाएगा जो बीएस-4 और उससे नए हैं, भले ही वे डीजल इंजन के मामले में दस साल और पेट्रोल इंजन के मामले में पंद्रह साल की सीमा पार कर चुके हों।
उल्लेखनीय है कि 2015 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए दिल्ली-एनसीआर में दस साल से अधिक पुराने डीजल और पंद्रह साल से अधिक पुराने पेट्रोल वाहनों के चलने पर रोक लगाने का निर्देश दिया था, जिसे 2018 में उच्चतम न्यायालय ने बरकरार रखा था।

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उच्चतम न्यायालय ने नागरिकता पर फैसले से पूर्व सीएए आवेदकों को मतदाता सूची में शामिल करने पर सवाल उठाया https://demo.theshikshanews.com/uchchatam-nyaayaalay-ne-naagarikata-par-phaisale-se-poorv-seeee-aavedakon-ko-matadaata-soochee-mein-shaamil-karane-par-savaal-uthaaya/ https://demo.theshikshanews.com/uchchatam-nyaayaalay-ne-naagarikata-par-phaisale-se-poorv-seeee-aavedakon-ko-matadaata-soochee-mein-shaamil-karane-par-savaal-uthaaya/#respond Wed, 10 Dec 2025 03:34:21 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5982 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। उच्चतम न्यायालय ने सवाल उठाया है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के तहत नागरिकता के लिये आवेदन करने वाले व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करने से पहले मतदाता सूची में अनंतिम रूप से कैसे शामिल किया जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ मंगलवार को एक गैर सरकारी संगठन(एनजीओ) आत्मदीप की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद सीएए के तहत नागरिकता के लिये पात्र बताए गये बांग्लादेशी प्रवासियों को मतदाता सूची में शामिल करने के निर्देश देने की मांग की गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने एनजीओ का पक्ष रखते हुये तर्क दिया कि हजारों शरणार्थियों के सीएए आवेदनों पर कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा कि नागरिकता का अधिकार आवेदन की तारीख से मिलना चाहिए, अन्यथा उनके आवेदनों पर कार्रवाई होने से पहले ही एसआईआर प्रक्रिया उन्हें मतदाता सूची से बाहर कर देगी। पीठ ने हालांकि यह कहा कि जब आवेदकों की नागरिकता की स्थिति की पुष्टि सक्षम प्राधिकारी ने नहीं की है, तो न्यायालय इसमें हस्तक्षेप कैसे कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, “आपको अभी तक नागरिकता प्रदान नहीं की गई है। संशोधित कानून आपको नागरिकता के लिए आवेदन करने का अधिकार दे सकता है, लेकिन ऐसे हर दावे पर इस बात का निर्धारण किया जाना आवश्यक है, क्या आप निर्दिष्ट अल्पसंख्यक समुदाय से हो, क्या निर्दिष्ट देशों से हो, और क्या आप भारत में हो। पहले इन मामलों का निर्धारण होना जरूरी है।”
न्यायमूर्ति बागची ने आगे कहा, “पहले आप नागरिकता हासिल करते हैं, तब मतदाता सूची में आपके नाम की बात आती है।” पीठ ने कहा कि स्थिति तय होने से पहले एनजीओ मतदाता के तौर पर पंजीकरण की मांग नहीं कर सकती। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता एक एनजीओ है और किसी भी व्यक्तिगत आवेदक ने सीधे न्यायालय का रुख नहीं किया है। न्यायालय ने कहा कि वह केवल नागरिकता संबंधी दावों के निर्धारण में सहायता कर सकता है, वैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार नहीं कर सकता।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम केवल आपकी स्थिति के निर्धारण में सहायता कर सकते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं।” श्री नंदी ने न्यायालय से लंबित सीएए आवेदनों पर निर्णय के लिए एक समय-सीमा निर्धारित करने का आग्रह किया, और बासुदेव दत्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में न्यायालय के पूर्व निर्देश का हवाला दिया, जिसमें सरकारी नियुक्तियों में पुलिस सत्यापन के लिए छह महीने की समय-सीमा निर्धारित की गई थी। उन्होंने इसी तरह की समय-सीमा की मांग करते हुए प्रस्ताव रखा कि अब तक प्राप्त आवेदनों पर फरवरी 2026 तक निर्णय लिया जाए।
पीठ ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा, “हम ऐसा नहीं कर पायेंगे।” निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि नागरिकता निर्धारित करने में निर्वाचन आयोग की कोई भूमिका नहीं है। उन्होंने कहा, “नागरिकता के मामले में हमारी कोई भूमिका नहीं है। सीएए के आवेदनों पर फैसला केन्द्र सरकार को ही लेना चाहिए।” दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने अटॉर्नी जनरल के माध्यम से केन्द्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए याचिकाकर्ता को निर्देश दिया गया कि वह याचिका की एक प्रति भारत के सॉलिसिटर जनरल को भी सौंपे। इस मामले में अगले सप्ताह फिर से सुनवाई होगी।

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दिल्ली में वायु प्रदूषण के लिए केवल किसानों का पराली जलाना जिम्मेदार नहींः उच्चतम न्यायालय https://demo.theshikshanews.com/dillee-mein-vaayu-pradooshan-ke-lie-keval-kisaanon-ka-paraalee-jalaana-jimmedaar-naheenh-uchchatam-nyaayaalay/ https://demo.theshikshanews.com/dillee-mein-vaayu-pradooshan-ke-lie-keval-kisaanon-ka-paraalee-jalaana-jimmedaar-naheenh-uchchatam-nyaayaalay/#respond Tue, 02 Dec 2025 15:25:07 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5925 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली में वायु प्रदूषण के संकट के लिए किसानों को अकेला जिम्मेदार ठहराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर सवाल उठाया।
न्यायालय ने कहा कि पराली जलाना कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान भी मौजूद था, जबकि राजधानी में उस समय असाधारण रूप से साफ आसमान देखा गया था।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण पर लंबे समय से लंबित एमसी मेहता की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पराली जलाने के आसपास की कहानी को ‘एक राजनीतिक मुद्दा या अहंकार का मुद्दा’ नहीं बनाया जाना चाहिए। पीठ ने दोहराया कि दिल्ली की जहरीली हवा के कई स्रोत हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने प्रदूषण के प्राथमिक योगदानकर्ताओं की पहचान करने वाले वैज्ञानिक विश्लेषणों पर स्पष्टता की मांग की। उन्होंने कहा कि जहाँ पराली जलाने को लगातार उजागर किया जाता है, वहीं ‘उन लोगों पर बोझ डालना गलत होगा जिनका न्यायालय में शायद ही कोई प्रतिनिधित्व हो।’ उन्होंने कहा कि कोविड के दौरान भी पराली जलाई गई थी। अब असली सवाल यह है कि उस समय साफ नीला आसमान क्यों दिखाई दे रहा था।
न्यायालय ने कहा कि किसान अक्सर अपनी आजीविका की रक्षा के लिए पराली जलाते हैं और उन्हें अनुचित रूप से दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।
पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह पराली जलाने के अलावा अन्य सभी प्रमुख प्रदूषण स्रोतों को रोकने के लिए उठाए गए प्रभावी उपायों पर एक सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
न्यायालय ने सरकार से पूछा कि क्या उसकी कार्य योजनाओं ने ठोस सुधार किए हैं? उन योजनाओं की फिर से जाँच क्यों नहीं की जा सकती है?
वहीं, सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ऐश्वर्या भाटी ने न्यायालय को बताया कि पंजाब, हरियाणा और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कार्रवाई रिपोर्ट जल्द ही दाखिल की जाएगी।
उन्होंने स्वीकार किया कि यह मुद्दा केवल मौसमी है और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के अध्ययनों के आधार पर वाहन उत्सर्जन और औद्योगिक धूल 2016 और 2023 से प्रदूषण के सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में बने हुए हैं।
न्यायमूर्ति बागची ने निर्माण गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण को रेखांकित करते हुए निर्माण प्रतिबंध की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाया। पीठ ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के सदस्यों की विशेषज्ञता और योग्यताओं पर विवरण मांगा।
एक वकील ने सुनवाई के दौरान सड़क किनारे अनियंत्रित पार्किंग की समस्या को उजागर करते हुए टिप्पणी की कि दिल्ली का वाहन घनत्व (व्हीकल डेंसिटी) कई प्रमुख शहरों के संयुक्त घनत्व से अधिक है।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि मेट्रो का विस्तार दीर्घकालिक राहत प्रदान कर सकता है लेकिन तत्काल, अल्पकालिक उपाय भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
वहीं, एक अन्य वकील ने कहा कि न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह के 1990 के दशक में सीएनजी बसों को अपनाने का निर्देश देने वाले आदेशों ने वायु गुणवत्ता में काफी सुधार किया था और आज भी ऐसे ही निर्णायक कदमों का आग्रह किया।
मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर को होगी।

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समय रैना और अन्य लोग दिव्यांगों की मदद करने के लिये जागरूकता कार्यक्रम करें: सुप्रीम कोर्ट https://demo.theshikshanews.com/samay-raina-aur-any-log-divyaangon-kee-madad-karane-ke-liye-jaagarookata-kaaryakram-karen-supreem-kort/ https://demo.theshikshanews.com/samay-raina-aur-any-log-divyaangon-kee-madad-karane-ke-liye-jaagarookata-kaaryakram-karen-supreem-kort/#respond Thu, 27 Nov 2025 17:09:46 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5878 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। उच्चतम न्यायालय ने कॉमेडियन समय रैना, विपुल गोयल, बलराज घई, सोनाली ठक्कर और निशांत तंवर को निर्देश दिया है कि वे अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल दिव्यांग लोगों, जिनमें स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) से पीड़ित लोग भी शामिल हैं, उनके लिए जागरूकता फैलाने और फंड जुटाने के लिए करें।
दूसरी ओर न्यायालय ने केंद्र सरकार से विकलांग लोगों की सुरक्षा के लिए एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसा एक खास कानून लाने पर भी विचार करने को कहा। मुख्य न्यायाधीश ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से पूछा, “आप विकलांग लोगों के लिए एससी-एसटी अधिनियम जैसे कानून के बारे में क्यों नहीं सोचते?”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची की एक पीठ ने गुरूवार को क्योर एसएमए फाउंडेशन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिये। इस याचिका में शिकायत की गई थी कि रैना और दूसरे कॉमेडियन ने अपनी ऑनलाइन सामग्री में दिव्यांग लोगों का मजाक उड़ाया है।
न्यायालय ने कहा कि कॉमेडियन को अपने प्लेटफॉर्म पर दिव्यांग लोगों को बुलाना चाहिए और लोगों के सामने उनकी सफलता और उपलब्धियों की कहानियां साझा करनी चाहिए। पीठ ने आदेश दिया कि हर महीने ऐसे दो प्रोग्राम होने चाहिए और यह आमदनी दिव्यांग लोगों के इलाज में मदद के लिए एक फंड में जमा की जानी चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि उम्मीद है कि अगली सुनवाई से पहले इस पर अमल कर दिया जायेगा।
एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ पैसे का नहीं है, बल्कि सम्मान और जागरूकता का भी है, क्योंकि एसएमए का इलाज बहुत महंगा है और ज़्यादातर दवाएं बाहर से मंगाई जाती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि कॉमेडियन विकलांग लोगों के साथ जागरूकता प्रोग्राम करें, जिस पर न्यायालय ने सहमति दे दी। पीठ ने ऑनलाइन असंवेदनशील सामग्री में बढ़ोत्तरी पर भी चिंता जताई।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “आज इनका निशाना विकलांग लोग हैं, कल महिलाएं हो सकती हैं, फिर बच्चे, फिर वरिष्ठ नागरिक समाज कहां जायेगा?” न्यायालय मामले की प्रगति की समीक्षा के बाद अगली सुनवाई करेगा।

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