politics – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com ( A Unit OF NCR Today News Paper Group ) Tue, 21 Oct 2025 17:14:01 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://demo.theshikshanews.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-Khabariya-Logo-Samal-32x32.jpg politics – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com 32 32 बिहार में 35 साल से किसी भी दल को बहुमत नहीं, गठबंधन राजनीति बनी परंपरा https://demo.theshikshanews.com/bihaar-mein-35-saal-se-kisee-bhee-dal-ko-bahumat-nahin-gathabandhan-raajaneeti-banee-parampara/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-mein-35-saal-se-kisee-bhee-dal-ko-bahumat-nahin-gathabandhan-raajaneeti-banee-parampara/#respond Tue, 21 Oct 2025 17:13:37 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5412 कुमार समीर
बिहार में अंतिम चरण की नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने के साथ ही चुनावी सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। जीत की अभिलाषा लिए नेताओं व उनके राजनीतिक दलों ने बढ़-चढ़कर दावे-प्रतिदावे करने शुरू कर दिए हैं। लेकिन कोई भी दल अपने दम पर बिहार में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का दावा नहीं कर रहा है। वह अपने दल वाली गठबंधन की जीत का दावा कर रहा है। ऐसा करना उनकी मजबूरी है क्योंकि तीन दशक से अधिक समय से यहां गठबंधन की ही सरकार रही है।
हकीकत है कि बिहार की सियासत में बिना गठबंधन कोई पार्टी नहीं चल पाती है । लगभग 35 साल से यहां हर सरकार जोड़-घटाव के फार्मूले पर बनी है। नीतीश-लालू से लेकर से दिवंगत रामविलास पासवान और अब उनके बेटे चिराग पासवान तक, सबका सफर बताता है कि बिहार को गठबंधन की आदत सी लग गई है।
भारत की दो सबसे बड़ी पार्टियां भाजपा और कांग्रेस का भी यहां यही हाल है। मौजूदा सत्तासीन बिहार सरकार में भाजपा जहां नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जदयू व चिराग की लोजपा (आर) व जीतन राम मांझी की हम व उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के साथ सरकार चला रही है वहीं प्रमुख विपक्षी दल राजद सत्ता में आने के लिए कांग्रेस, वामपंथी दलों व वीआईपी के साथ चुनावी मैदान में उतरीं हुईं हैं।
सच कहें तो ऐसा लगता है कि बिहार को गठबंधन की लत सी लग गई है। अगर बिहार की सत्ता की गठबंधन वाली स्क्रिप्ट देखी जाए, तो 1990 से अब तक दो ही चेहरे हर फ्रेम में मुख्य रूप से रहे हैं, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार। लालू ने 1990 में बीजेपी के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी पाई, फिर उसी बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाया। नीतीश कुमार भी कम पीछे नहीं रहे, वे बीजेपी से नाता जोड़कर मुख्यमंत्री बने, फिर आरजेडी से मिल गए, फिर दोबारा एनडीए में लौटे।
इन 35 सालों में नीतीश कुमार ने 9 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन हर बार किसी न किसी गठबंधन के सहारे। लालू और नीतीश की राजनीति इस बात की मिसाल है कि सियासी कुर्सी का रास्ता अब विचारों से नहीं, जोड़-घटाव और गठबंधन के गलियारों से तय होता है।
यह भी कटु सच है कि बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों के बिना अधूरी है। यादव, कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, मुसलमान, हर वर्ग को एक “राजनैतिक ठिकाना” चाहिए, और यही ठिकाने ही गठबंधन की जमीन बनाते हैं। उदाहरण के लिए, आरजेडी का ‘MY समीकरण’ (मुस्लिम-यादव) तभी काम करता है जब कांग्रेस या वाम दल जैसे सहयोगी दल उसके साथ आएं।
भाजपा को भी नीतीश या जीतनराम मांझी जैसे सहयोगियों की जरूरत पड़ती है, ताकि उसे सवर्ण से लेकर अतिपिछड़ा वोट तक एक साथ मिल सके। यानी बिहार में “किसका वोट किसके पास जाएगा” यही असली विज्ञान है, और गठबंधन ही उसकी केमिस्ट्री।
ऐसे में यह सवाल भी जब तब उठता रहता है कि बिहार में गठबंधन की मजबूरी है या कमजोरी? इतिहास में जाएं तो 1967 से अब तक बिहार ने 9 बार सरकारें बदली हैं, कई बार मुख्यमंत्री का कार्यकाल हफ्ते तक ही चल सकी हैं। इन सबसे राजनीतिक पार्टियों ने जो आउटपुट निकाला वो है, “अकेले लड़ना नुकसान का सौदा है”। यही सोच अब गहराई तक बैठ गई है।
चुनाव लड़ने से पहले ही पार्टियां पोस्ट-इलेक्शन अरेंजमेंट सोचने लगती हैं। आज की तारीख में महागठबंधन में 7 दल और एनडीए में 5 सहयोगी दलें शामिल हैं, जिनके बीच सीट बंटवारे को लेकर अंदरखाने जंग भी देखने को मिला था। पर यह सच भी है कि जैसे ही नतीजे बदलते हैं, गठबंधन भी बदल जाता है।
सच्चाई है कि बिहार में “गठबंधन मजबूरी सी हो गई है। असल में, बिहार में कभी किसी एक पार्टी को 35% से ज़्यादा वोट नहीं मिले। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की बात करें तो बिहार में कभी भी वह अपने दम पर सरकार नहीं बना पाई है। जितने भी समय बीजेपी बिहार की सत्ता में रही है, वो जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के सहारे और नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही रही है।
साल 2015 में जब बीजेपी ने जेडीयू से अलग होकर चुनाव लड़ा, तो पार्टी सिर्फ़ 53 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं 2020 में पार्टी ने जेडीयू के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, तो बीजेपी को 74 और जेडीयू को सिर्फ़ 43 सीट मिली थी। बीजेपी 2020 में जेडीयू से बड़ी पार्टी बनी थी लेकिन उसने अपना मुख्यमंत्री नहीं बनाया। पार्टी को बिहार की जातीय संरचना के चलते नीतीश का साथ किसी भी क़ीमत पर चाहिए। नीतीश के साथ नहीं रहने पर उसकी स्थिति 2015 जैसी हो जाती है। यानी, अकेले दम पर कोई पार्टी यहां जीत नहीं पाती है, इसलिए सबको दोस्ती करनी पड़ती है। ये सिलसिला समाज की अलग-अलग जातियों से शुरू हुआ और अब राजनीति की मजबूरी बन गया है। जितनी जातियां, उतने नेता और सबको थोड़ा-थोड़ा हिस्सा चाहिए। नतीजा ये हुआ कि जनता आज तक नहीं समझ पाई कि असली जिम्मेदारी किसकी है ?
हालांकि जाति आधारित राजनीति को तोड़ने की बिहार में पहली बार कोशिश की गई है और यह कोशिश करने वाला कोई और नहीं बल्कि जाना पहचाना नाम प्रशांत किशोर हैं। उनकी पार्टी जनसुराज इस बार के चुनाव में बिना किसी दूसरे दलों के साथ गठबंधन कर दमखम के साथ लगी हुई है। बिना किसी जाति धर्म आदि को देखते हुए जनसुराज ने पढ़े लिखे कैंडिडेट्स उतारे हैं लेकिन रिजल्ट क्या रहता है, यह देखने वाली बात होगी।
अगर जनसुराज कुछ करिश्मा करने में सफल हो जाता है तो बिहार में एक अलग तरह की राजनीति की बुनियाद पड़ जाएगी जो आने वाले समय के लिए निसंदेह अच्छा रहेगा लेकिन बिहार जैसे राज्य जहां जाति आधारित राजनीति ही होती रही है वहां जनसुराज की सोच कितना असर डाल पाती है यह देखने वाली बात होगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

]]>
https://demo.theshikshanews.com/bihaar-mein-35-saal-se-kisee-bhee-dal-ko-bahumat-nahin-gathabandhan-raajaneeti-banee-parampara/feed/ 0
बिहार चुनाव में इसबार भी हावी रहेगी जाति आधारित राजनीति https://demo.theshikshanews.com/bihaar-chunaav-mein-isabaar-bhee-haavee-rahegee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-chunaav-mein-isabaar-bhee-haavee-rahegee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/#respond Wed, 15 Oct 2025 14:57:53 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5359 इंद्र शेखर शाह/लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए बिगुल बजते ही प्रदेश के दो प्रमुख गठबंधनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और राष्ट्रीय जनता दल नीति महागठबंधन के साथ ही बिहार से राजनीति की शुरूआत कर रही जन सुराज पार्टी अपने अपने मुद्दों को लेकर लोगों के बीच पहुंच चुकी है तथा ये मुद्दे बिहार चुनाव को गर्म और जटिल बनाए हुए हैं। बेरोजगारी और पलायन युवाओं को प्रभावित कर रहे, जबकि जाति और वोटर लिस्ट विवाद पारंपरिक वोट बैंकों को प्रभावित कर सकते हैं। राजग “विकास” और “सुशासन” पर जोर दे रही, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) “ सामाजिक न्याय” और “नौकरी” के वादे पर जोर दे रहा जबकि जन सुराज नया विकल्प बनने की कोशिश में है। बिहार के लिए सबसे बड़े पर्व छठ पूजा के बाद 6 और 11 नवंबर की वोटिंग में टर्नआउट और ग्राउंड मूड निर्णायक होगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई प्रमुख मुद्दे मतदाताओं और राजनीतिक दलों के बीच चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। ये मुद्दे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों से जुड़े हैं और बिहार की ग्राउंड रियलिटी को दर्शाते हैं। बिहार में बेरोजगारी एक दीर्घकालिक और गंभीर है। 2023-24 के डेटा के अनुसार, बिहार में बेरोजगारी दर 6.8 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत (3.2 प्रतिशत) से दोगुनी है। युवा (15-29 आयु वर्ग) में बेरोजगारी 13-15 प्रतिशत तक है। इसके परिणामस्वरूप, लगभग 75 लाख बिहारी प्रवासी मजदूर दिल्ली, मुंबई, पंजाब और अन्य राज्यों में काम कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार बिहार की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, जो रोजगार की कमी को और उजागर करता है।
राजद ने हर परिवार में एक नौकरी देने का वायदा किया है जो 2020 के उसके “10 लाख सरकारी नौकरी” के वादे का विस्तार है। युवा वोटर इस वादे को लेकर उत्साहित दिखते हैं, लेकिन इसे अव्यवहारिक भी कहते हैं क्योंकि इसके लिए लाखों करोड़ रुपये की जरूरत होगी जबकि बिहार का बजट ही तीन लाख करोड़ रुपये का है। इसके लिए वित्त पोषण कहां से किया जायेगा इसका कोई उल्लेख कहीं नहीं है। बिहार में बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण के बगैर सरकार राजस्व नहीं बढ़ा पायेगी। ऐसी स्थिति में इस तरह के वादे अव्यवहारिक ही है।
वहीं बिहार की नीतीश कुमार की सरकार दावा करती है कि 5 लाख सरकारी नौकरियां दी गईं और बिहार में औद्योगिक निवेश बढ़ा। हालांकि लोगों का कहना है कि “नौकरियां केवल कागज पर हैं” और ठोस औद्योगिक विकास नहीं हुआ। चुनाव प्रबंधक से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने बेरोजगारी को “बिहार की सबसे बड़ी बीमारी” कहा है और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार और स्टार्टअप को बढ़ावा देने का वादा किया है। उनकी रैलियों में युवा भीड़ दिख रही है लेकिन ये भीड़ वोट में तब्दील होने पर ही जन सुराज पार्टी कोई बदलाव करने की स्थिति में होगी। हालाँकि अब तक जो रूख दिख रहा है उसमें जन सुराज पार्टी के भी बड़े पैमाने पर उलट फेर करने में सफल रहने की संभावना बहुत कम है। हालांकि बेरोजगारी को लेकर युवा वोटरों में कुछ नाराजगी दिख रही है लेकिन प्रधानमंत्रर नरेन्द्र मोदी के कारण राजग की स्थिति अभी तक बेहतर है।
बिहार की राजनीति में जाति एक केंद्रीय कारक है। 2023 की बिहार जाति जनगणना के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईबीसी) 36 प्रतिशत, ओबीसी 27 प्रतिशत, यादव 14 प्रतिशत और दलित 19 प्रतिशत मुख्य वोट बैंक हैं। ऊपरी जातियां भूमिहार और राजपूत 10 प्रतिशत हैं जबकि मुस्लिम 17 प्रतिशत हैं। राजद यादव और मुस्लिम समीकरण पर निर्भर। तेजस्वी यादव ने ईबीसी और दलितों को लुभाने के लिए “सामाजिक न्याय” और आरक्षण बढ़ाने की बात कही है।
राजग के नेतृत्वकर्ता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ईबीसी और कुर्मी आधार मजबूत है। उनकी “लव-कुश” (कुर्मी-कोइरी) रणनीति और ईबीसी को विशेष पैकेज देना वोटरों को आकर्षित कर रहा। भाजपा पी: ऊपरी जातियों और गैर-यादव ओबीसी पर फोकस कर रही है जबकि प्रशांत किशोर ने “जाति-मुक्त राजनीति” की बात कही है, लेकिन उनकी रैलियों में ईबीसी और ऊपरी जातियों की भागीदारी ज्यादा दिख रही।राजग विशेषकर भाजपा बिहार चुनाव को सुशासन बनाम जंगलराज बनाने की पूरी कोशिश कर रही है।इसके लिए नीतिश कुमार के कार्यकाल को सुशासन और विकास वाला बताया जा रहा है।
लेखक बिहार के मतदाता हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं

]]>
https://demo.theshikshanews.com/bihaar-chunaav-mein-isabaar-bhee-haavee-rahegee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/feed/ 0