politics end – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com ( A Unit OF NCR Today News Paper Group ) Mon, 06 Oct 2025 06:03:59 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://demo.theshikshanews.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-Khabariya-Logo-Samal-32x32.jpg politics end – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com 32 32 बिहार : क्या ख़त्म होगी जाति आधारित राजनीति ? https://demo.theshikshanews.com/bihaar-kya-khatm-hogee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-kya-khatm-hogee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/#respond Mon, 06 Oct 2025 06:03:59 +0000 https://www.khabariya.com/?p=5242 कुमार समीर
जाति आधारित राजनीति के लिए जाने जाने वाले बिहार में यह क्या देखने को मिल रहा है ? क्या यहां जाति आधारित राजनीति ख़त्म होने जा रही है ? इस सवाल को सुनकर आप जरूर आश्चर्यचकित होंगे कि घोर जातिवादी राजनीति करने वाले बिहार में यह क्या संभव है ? एक बार में तो हर किसी का यही ज़वाब होगा कि यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार में जातिवाद आधारित राजनीति खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है और इसे शुरू करने वाला और कोई नहीं बल्कि घोर जातिवादी राजनीति करने वाले दल ही हैं। आने वाले कुछ सालों में इसका असर साफ तौर पर दिखाई भी देने लगेगा।
जी हां, बिहार का यह नया रुख पूरे देश में अलख जगाने का काम कर सकता है। इसकी शुरुआत हो चुकी है क्योंकि यहां (बिहार) की राजनीति में पहली बार जाति की जगह क्लास (वर्ग) का महत्व बढ़ता दिख रहा है। सरकारी योजनाओं में महिलाओं, किसानों और पेंशनभोगियों को क्लास के रूप में संबोधित किया जा रहा है। मसलन शिक्षा में मुफ्त योजनाओं की ही बात करें तो दिन का भोजन, साइकिल तथा स्कूल यूनिफॉर्म वितरण में जाति नहीं देखी जा रही है। इसका असर भी दिखने लगा है। छात्रों के विकास को जहां बढ़ावा मिल रहा है वहीं महिलाओं को स्वरोजगार के लिए आर्थिक सहायता भी दी जा रही है।
इस तरह की पहल के बाद कहा जा सकता है कि बिहार में अब ठोस आकार ले रहा है जाति को क्लास (वर्ग) में बदलने का प्रयास। राजनीतिक दलों की घोषणाओं और केंद्र-राज्य सरकार की नीतियों पर गौर करें तो इसका आभास होना शुरू हो जाएगा। हालांकि यह भी सच है कि जाति के क्लास में बदलने के प्रयास का यह प्रारंभिक दौर है। इसलिए जाति और क्लास (वर्ग) -दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। जाति का आग्रह जैसे-जैसे कम होगा, वर्ग मजबूत होने लगेगा। यहां सबसे अच्छी बात यह है कि इस बदलाव की पहल सरकार की ओर से हो रही है। वहीं विपक्षी दल भी इसका विरोध नहीं बल्कि अनुसरण ही कर रहे हैं। इसे महिलाओं के मामले में देखें। पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण से शुरुआत हुई जो अब सभी के लिए है।
बिहार की सभी सेवाओं में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत पद आरक्षित कर दिए गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006-07 में जब बालिकाओं के लिए पोशाक और किताब की योजना शुरू की तो इसमें सबको समाहित किया गया। जाति-धर्म के आधार पर किसी बालिका को इस योजना से बाहर नहीं किया गया। इसका विस्तार बालकों के बीच भी हुआ। फिर साइकिल देने का निर्णय लिया गया। अब तो उन्हें मैट्रिक से लेकर पीजी तक की परीक्षाओं में पास होने पर भी अधिकतम 75 हजार रुपये दिए जा रहे हैं।
शिक्षा से जुड़ी मुफ्त योजनाओं का असर यह हुआ कि बच्चों का विकास छात्र वर्ग के रूप में होने लगा। यूनिफार्म ने बड़ा बदलाव किया। पहले स्कूली बच्चों के पोशाक से ही उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का पता चलता था। बच्चों के बीच श्रेष्ठता और हीनता का भाव भी पनपता था। 20 वर्ष पहले जिन बच्चों को इस योजना का लाभ मिला, वे आज के युवा हैं। मतदाता भी हैं। हाल-फिलहाल सभी परिवारों की एक महिला को स्वरोजगार के लिए 10 हजार रुपये देने की योजना बनी।
बताते चलें कि घोषणा यह की गई है कि 10 हजार रुपये से सफलतापूर्वक कारोबार प्रारंभ करने वाली महिलाओं को आने वाले दिनों में दो लाख रुपये तक दिए जाएंगे। दिसंबर तक इस योजना के अंतर्गत एक करोड़ 80 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये दिए जाएंगे। महिलाएं इस योजना का लाभ एक क्लास (वर्ग) की तरह ले रही हैं। बदलाव यह आया है कि विरोधी दल की ओर से जो घोषणाएं हो रही हैं, उनमें भी महिलाओं के साथ एक क्लास (वर्ग) की तरह व्यवहार किया जा रहा है। इस योजना के दायरे में एक करोड़ 79 लाख महिलाएं हैं।
किसान और पेंशनधारियों को भी एक क्लास (वर्ग) के रूप में आज केंद्र और राज्य सरकार एक क्लास (वर्ग) के रूप में संबोधित कर रही हैं। उन्हें प्रोत्साहन के लिए खाते में राशि भेजी जा रही है। किसान सम्मान निधि के रूप में सभी किसानों के खाते में प्रति वर्ष छह-छह हजार रुपये प्रधानमंत्री की ओर से दिए जा रहे हैं।
किसानों को कृषि यंत्रों के लिए अनुदान दिए जा रहे हैं। अनाजों की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुविधा सभी किसानों को दी जा रही है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन देने के मामले में भी जातीय भेद समाप्त किया गया है। यहां भी आर्थिक आधार को रखा गया है।
इतना ही नहीं, आयकर दाता और पहले से किसी योजना के तहत पेंशन पा रहे लोगों को छोड़कर 60 वर्ष और उससे अधिक के नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन की परिधि में ले आया गया है। इसने बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन का आधार दिया है।
सामाजिक सुरक्षा पेंशन पाने वालों की कुल संख्या एक करोड़ 40 लाख से अधिक है। सरकारी सेवाओं में आरक्षण को लेकर समाज के एक हिस्से में बड़ा असंतोष था। जातीय संरचना में ऊंची श्रेणी में रहने के बावजूद गरीबों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता था।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ देकर इस समूह को भी संतुष्ट किया गया है। इसके कारण आरक्षण की सुविधा हासिल करने वाला भी एक अलग क्लास (वर्ग) बन गया है। रोजगार और नौकरी की मांग ऐसी है, जिसकी पूर्ति के लिए युवा एक क्लास (वर्ग) की तरह सड़क पर उतर रहे हैं।
इसे बदलाव की बयार ही कह सकते है कि अब जाति नहीं, गरीबी देखने की बात उठनी शुरू हो गई है। दो वर्ष पहले सभी दलों की पहल पर जाति आधारित गणना हुई। पता चला कि राज्य में 94 लाख से अधिक ऐसे परिवार हैं, जिनकी मासिक आय छह हजार रुपये या उससे कम है।
सरकार ने ऐसे परिवार को कारोबार के लिए दो लाख रुपये देने का नीतिगत निर्णय लिया है। यहां भी जाति के बदले क्लास (वर्ग) को लाभ पहुंचाने के लक्ष्य को देखा जा सकता है। सरकारें पहले भी गरीब कल्याण के लिए योजनाएं चलाती रही हैं, लेकिन वह समाज के सभी गरीबों के लिए नहीं होती थीं। शुरुआत अनुसूचित जाति और जनजाति से होती थी, जो पिछड़े वर्गों तक आकर ठहर जाती थी। उन योजनाओं में लाभ लेने के लिए किसी जाति का होना जरूरी होता था।
समय के साथ इस तरह के बदलाव को हर तबका स्वीकार कर रहा है, यह सबसे बड़ी और सकारात्मक बात है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार और सभी राजनीतिक दल अगर इसी तरह से इस अच्छी पहल का समर्थन करते रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब सबका साथ, सबका विकास हर वर्ग, हर समुदाय महसूस करने लगेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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