EC – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com ( A Unit OF NCR Today News Paper Group ) Tue, 18 Nov 2025 07:05:36 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://demo.theshikshanews.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-Khabariya-Logo-Samal-32x32.jpg EC – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com 32 32 पश्चिम बंगाल की जीत का दावा भाजपा कितनी मजबूत https://demo.theshikshanews.com/pashchim-bangaal-kee-jeet-ka-daava-bhaajapa-kitanee-majaboot/ https://demo.theshikshanews.com/pashchim-bangaal-kee-jeet-ka-daava-bhaajapa-kitanee-majaboot/#respond Tue, 18 Nov 2025 07:05:36 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5802 पश्चिम बंगाल में अभी चुनाव होने में एक साल है ,लेकिन जिस तरह से बिहार चुनाव के रिजल्ट के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में पश्चिम बंगाल का नाम क्या लिया अब चर्चा पश्चिमी बंगाल की छिड़ गई है सबसे बड़ा सवाल यही है , भाजपा इसके लिए कितना तैयार है, भजपा के लिए बिहार विजय का समीकरण पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरण से कितना मेल खाता है।

विजय मिश्र

बिहार विधानसभा चुनाव के बाद कई राज्यों में चुनाव होने हैं । उन राज्यों के लिए बीजेपी ने अपने राजनीतिक आधार के मजबूत होने का दावा करना शुरू कर दिया है. बिहार चुनाव के बाद प्रधानमंत्री का इशारा मिलते ही भारतीय जनता पार्टी के नेता अब पश्चिम बंगाल जीतने का दावा कर रहे हैं. बिहार में जिस तरह के चुनाव परिणाम आए हैं वह भारतीय जनता पार्टी के लिए नई रणनीति का नया स्वरूप जरूर खड़ा कर रहे हैं. यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी 2026 के मार्च अप्रैल महीने में होने वाले पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर अभी से जीत का दावा करना शुरू कर चुकी है।
लंबे समय से इंतजार कर रही भाजपा का इस बार बिहार विजय चुनाव ने कई नए राजनीतिक समीकरण गढ़ दिए अब तक राजनीतिक समीक्षक इस बात को मानते रहे थे कि देश में जो शहरी विधानसभा सीटे हैं उनको बीजेपी आसानी से जीत लेती है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी बीजेपी की उतनी मजबूत पकड़ नहीं है. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने गठबंधन के नए आधार को खड़ा कर दिया. बिहार में जिस वोट बैंक पर परंपरागत वोट बैंक की बात होती थी वो दावा भी टूट गया।
उदाहरण के तौर पर देखे तो इस बार बिहार कब शहरी क्षेत्र के तीस में 29 सीट जीती , सेमी अर्बन में 12 सीट में 8 सीट पर जीत हासिल हुई, वही 201 ग्रामीण सीट में 167 सीट एनडीए के खाते में गई। कुल 243 में 202 सीट एनडीए के खाते में रही । और सबसे खास बात यह जेडीयू के साथ रहने के कारण उन सीट पर भी जीत मिली जिसमे जातीय समीकरण में मुस्लिम वोटर थे , आंकड़ो की बात करे तो पसमांदा समाज के करीब 5 प्रतिशत वोट भी इस बार एनडीए के खाते में रहा तो वही सामान्य मुसलमान के भी 5 प्रतिशत से ज्यादा वोट एनडीए खिंचने में सफल रही जिसका श्रेय नीतीश का साथ रहना बताया गया। अब बात करते है पश्चिम बंगाल का बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच चल रही चुनावी लड़ाई ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को एक चुनावी जंग में तब्दील कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी में से किसका पलड़ा भारी यह तो 2026 के चुनाव ही बताएंगे लेकिन जो चुनावी समीकरण इससे पहले रहे उसकी बात करते है।
बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच चल रही चुनावी लड़ाई ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को एक चुनावी जंग में तब्दील कर दिया है। एक तरफ़ जहाँ बीजेपी की तरफ़ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी अपनी पूरी ताक़त झोंकने की बात कह रही है तो , वहीं दूसरी ओर टीएमसी की सबसे जुझारू नेता ममता बनर्जी ने अपनी रणनीति के सहारे अपनी सत्ता बरकरार रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।
अब सवाल है क्या बंग की जंग में बीजेपी टीएमसी के क़िले में सेंध लगा पाएगी या सिर्फ़ हवा बनाने की कोशिश कर रही है और क्या अंत में तृणमूल कांग्रेस की ही बड़ी जीत होने वाली है?
कई ऐसे पहलू हैं जिससे ऐसा लगता है कि बीजेपी के लिए बंगाल चुनाव उतना आसान नहीं होने जा रहा है। आइए, बारी-बारी से विश्लेषण करते हैं- पिछले चुनाव की बात करे तो भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति यहाँ पर फेल हो गई थी आपको बता दे
पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में सीएए लागू करने का वादा कर साफ़ कर दिया है कि वह राज्य में अपने एजेंडे पर पूरी तरह क़ायम है और उसमें कोई बदलाव नहीं आया है।
इस बार भी पार्टी के चुनाव प्रचारक भी अपने अभियान में इस पर जोर दे रहे हैं। पर बीजेपी का ब्रह्मास्त्र (ध्रुवीकरण) अब तक यहाँ पर ज़मीनी स्तर पर उतना कारगर होता नहीं दिख रहा है जितना बीजेपी के थिंक टैंक को उम्मीद है।
कुछ क्षेत्रों को छोड़ दें (मुर्शिदाबाद, मालदा, ब्रह्मपुर, हुगली) तो मुसलमान तबक़े का समर्थन ममता बनर्जी को एकतरफ़ा मिलता हुआ दिख रहा है। इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण नंदीग्राम है जहाँ ममता को मुसलमान तबक़े का मत एकतरफ़ा मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ हिंदू तबक़े में विभाजन साफ़ देखा जा रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि अभी भी स्थानीय बंगालियों में ममता के प्रति झुकाव बना हुआ है। वही दूसरा सबसे बड़ा कारण है विपक्षी दलों का ममता को सहयोग मिलना आपने देखा होगा।
कांग्रेस और लेफ्ट उसी क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जहाँ उन्हें जीतने की उम्मीद सबसे ज़्यादा है। कांग्रेस नहीं चाहती है कि उसके कारण ममता के मतों में विभाजन हो, खासकर अल्पसंख्यक तबक़े का, और इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि राहुल गांधी या कांग्रेस के किसी भी बड़े राष्ट्रीय नेताओं का बंगाल की तरफ रुख न करना। यह साफ दिख है कि कांग्रेस ने पिछले चुनाव में अधीर रंजन चौधरी, गनी खान चौधरी के सहारे मालदा, मुर्शिदाबाद ब्रह्मपुर और दिनाजपुर तक अपने आप को सीमित कर रखा है। जबकि हक़ीक़त यह है कि कांग्रेस अभी भी बंगाल में मुख्य विपक्षी पार्टी है जिनके 44 विधायक हैं।
वही भाजपा की बात करे तो ज्यादातर चुनाव में वह बगैर कप्तान के ही चुनाव में उतरती है , फिर वह चाहे मध्यप्रदेश हो या फिर राजस्थान जहाँ उन्हें भारी सफलता भी मिली लेकिन वही बात पश्चिम बंगाल में खतरा बन जाता है , यहाँ पर बीजेपी के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करना सबसे बड़ा नकारात्मक फ़ैक्टर साबित हो जाता है।
यदि बीजेपी के पास ममता के मुक़ाबले कोई लोकप्रिय चेहरा होता तो मुक़ाबला और दिलचस्प होने की संभावना रहती । बंगाल के लोगों के मानस में यह बात है कि ममता नहीं तो कौन? यह कौन ही भाजपा के लिए मुश्किल खड़ा करता है।
बंगाल की बात करे तो यहाँ पर बीजेपी का अंतरकलह किसी से छिपा हो ,बंगाल बीजेपी की अंदरूनी कलह पार्टी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होता दिख रहा है। पिछली बार पार्टी ने टीएमसी से आए क़रीब 150 नेताओं को इ टिकट दिया है जिससे पुराने कार्यकर्ताओं में रोष कायम रहा जो साफ तौर पर देखने को मिला।
वही अन्य राज्यो के मुकाबले यहाँ पर भाजपा का संगठन उतना मजबूत नही है , उत्तरी बंगाल की तुलना में बीजेपी दक्षिण बंगाल में अभी भी संगठनात्मक रूप से बहुत कमजोर है। 2019 लोकसभा चुनाव के परिणाम को भी देखेंगे तो दक्षिण बंगाल में बीजेपी का प्रदर्शन उतना बेहतर नहीं था जितना उत्तर बंगाल में। क़रीब 60 से 65 फ़ीसदी विधानसभा क्षेत्र दक्षिण बंगाल से आते हैं और वहाँ टीएमसी अभी भी अपनी पैठ बनाए हुए है। यदि बीजेपी दक्षिण के क़िले को फतह कर पाती है तो फिर परिणाम बीजेपी के पक्ष में हो सकते हैं।
देखा जाय तो बिहार चुनाव के बाद भाजपा ने पश्चिम बंगाल के लिए अपनी चुनावी बिगुल फूंक दी है , लेकिन यहाँ जीत हासिल करना उतना सरल नही है ,क्योकि जो जातीय समीकरण अन्य राज्यो में है वह पश्चिम बंगाल में नही है वही बाहर से आये नेता और संगठन का पूरी तरह से प्रदेश में स्थापित न हो पाना इससे भी भाजपा को पार पाना होगा हालांकि अगर बंगाल के समीकरण में भाजपा के पक्ष की बात करे तो S I R लागू होना जरूर वोट के समिकरण को बदलेगा।

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बिहार में प्रथम चरण के 121 विधानसभा क्षेत्र में थम गया प्रचार का शोर https://demo.theshikshanews.com/bihaar-mein-pratham-charan-ke-121-vidhaanasabha-kshetr-mein-tham-gaya-prachaar-ka-shor/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-mein-pratham-charan-ke-121-vidhaanasabha-kshetr-mein-tham-gaya-prachaar-ka-shor/#respond Tue, 04 Nov 2025 15:38:10 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5649 NCR TODAY. Khabariya. Webvarta. Patna। बिहार में 121 विधानसभा सीटों पर प्रथम चरण में 06 नवंबर को होने वाले मतदान के लिए आज शाम प्रचार का शोर थम गया और अब प्रत्याशी जनसम्पर्क के जरिये वोट जुटाने में लग गये हैं।
पहले चरण के चुनाव में राष्ट्रीय जनतंत्रिक गठबंधन (राजग) से जिन दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, उनमें दोनों उप मुख्यंमत्री सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा, 15 मंत्री विजय कुमार चौधरी,श्रवण कुमार,मंगल पाण्डे,मदन सहनी,नितिन नवीन,महेश्वर हजारी,सुनील कुमार,रत्नेश सदा,केदार प्रसाद गुप्ता, सुरेन्द्र मेहता,संजय सरावगी, डा. सुनील कुमार, जिवेश कुमार,राजू कुमार सिंह और कृष्ण कुमार मंटू के अलावा बिहार विधानसभा के उपाध्यक्ष नरेन्द्र नारायण यादव, राम कृपाल यादव,श्याम रजक, अनंत सिह, अमरेन्द्र पांडेय, हरिनारायण सिंह, उमेश कुशवाहा और श्रेयसी सिंह शामिल हैं। इसी तरह महागठबंधन से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव के अलावा अवध बिहारी चौधरी,डा. रामानंद यादव, वीणा देवी,ललित कुमार यादव,विजेन्द्र चौधरी, रेणु कुशवाहा, खेसारी लाल यादव,आलोक मेहता,भाई वीरेन्द्र, अनिरूद्ध यादव,अवधेश राय के नाम शामिल है।इसके अलावा तेज प्रताप यादव, आईपी गुप्ता, शिवदीप लांडे,आनंद मिश्रा, वी.के.रवि, जयप्रकाश सिंह, आर.के.मिश्रा, राम नारायण सिंह, पुष्पम प्रिया, के.सी. सिन्हा समेत अन्य की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुयी है।
प्रथम चरण में 121 विधानसभा क्षेत्रों के मतदान में 06 नवंबर को 45341 मतदान केंद्रों पर तीन करोड़ 75 लाख 13 हजार 302 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर 122 महिला और 1192 पुरुष प्रत्याशी समेत कुल 1314 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में बंद कर देंगे। मतदाताओं में एक करोड़ 98 लाख 35 हजार 325 पुरुष, एक करोड़ 76 लाख 77 हजार 219 महिला और 758 तीसरे जेंडर के लोग शामिल हैं। पहले चरण के चुनाव में सबसे अधिक 20 उम्मीदवार कुढ़नी और मुजफ्फरपुर में वहीं भोरे, अलौली और परबत्ता में सबसे कम पांच प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतरे हैं।
प्रथम चरण में राज्य के जिन 121 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव होना है उनमें उनमें आलमनगर,बिहारीगंज, सिंहेश्वर (सुरक्षित),मधेपुरा,सोनबर्षा (सुरक्षित),सहरसा,सिमरी बख्तियारपुर,महिषी,कुशेश्वरस्थान (सुरक्षित), गौराबौराम, बेनीपुर,अलीनगर,दरभंगा ग्रामीण,दरभंगा, हायाघाट,बहादुरपुर, केवटी,जाले, गायघाट , औराई, मीनापुर, बोचहां (सुरक्षित), सकरा (सुरक्षित), कुढ़नी, मुजफ्फरपुर,कांटी,बरुराज,पारू,साहेबगंज,बैकुंठपुर,
बरौली, गोपालगंज, कुचायकोट भोरे (सुरक्षित),हथुआ,सिवान,जीरादेई,दरौली सुरक्षित),रघुनाथपुर, दरौंधा,
बड़हरिया,गोरियाकोठी,महराजगंज,एकमा,मांझी,बनियापुर,तरैया, मढ़ौरा , छपरा, गरखा (सुरक्षित),
अमनौर,परसा,सोनपुर,हाजीपुर,लालगंज,वैशाली,महुआ,राजा पाकड़ (सुरक्षित), राघोपुर, महनार,पातेपुर (सुरक्षित), कल्याणपुर (सुरक्षित), वारिसनगर, समस्तीपुर,उजियारपुर, मोरवा, सरायरंजन, मोहिउद्दीननगर,
विभूतिपुर,रोसड़ा (सुरक्षित),हसनपुर, चेरिया बरियारपुर,बछवाड़ा, तेघड़ा, मटिहानी साहेबपुर कमाल,
बेगूसराय,बखरी (सुरक्षित),अलौली(सुरक्षित),खगड़िया, बेलदौर,परबत्ता,तारापुर,मुंगेर, जमालपुर, सूर्यगढ़ा,
लखीसराय,शेखपुरा ,बरबीघा,अस्थावां, बिहारशरीफ,राजगीर (सुरक्षित), इस्लामपुर, हिलसा,नालन्दा,
हरनौत,मोकामा,बाढ़, बख्तियारपुर, दीघा, बांकीपुर, कुम्हरार,पटना साहिब,फतुहा,दानापुर,मनेर,फुलवारी (सुरक्षित),मसौढ़ी (सुरक्षित),पालीगंज,बिक्रम,सन्देश, बड़हरा,आरा,अगिआंव(सुरक्षित),तरारी,जगदीशपुर,
शाहपुर,ब्रह्मपुर,बक्सर,डुमराँव और राजपुर (सुरक्षित) शामिल है।
पहले चरण के चुनाव के लिए राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, नितिन गडकरी, जनता दल यूनाईटेड (जदयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी,
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव,समेत कई दिग्गज नेताओं ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार किया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने राजधानी पटना में रोड शो भी किया। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस और वामदलों के महागठबंधन के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार का जिम्मा मुख्य रूप से कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे,नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) प्रमुख मुकेश सहनी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी (भाकपा-माले) के राष्ट्रीय महासचिव दीपंकर भट्टाचर्य के कंधे पर था। राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने दानापुर में पार्टी के उम्मीदवार के लिये रोड शो किया। जनसुराज से पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार किया।
प्रथम चरण में 06 नवंबर को मतदान का सामान्य समय सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक रहेगा। सुरक्षा कारणों से सिमरी बख्तिायारपुर ,महिषी और सूर्यगढ़ा के 56 मतदान केन्द्रों पर मतदान सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक ही चलेगा। प्रथम चरण के चुनाव में राजग के घटक जदयू के 57, भाजपा के 48, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के 13 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के दो प्रत्याशी चुनावी अखाड़े में उतारे हैं। एक अन्य सीट मढ़ौरा में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) प्रत्याशी भोजपुरी फिल्म अभिनेत्री सीमा सिंह का नामांकन रद्द हो गया था।राजग ने इस सीट पर निर्दलीय अंकित कुमार को समर्थन दिया है।वहीं महागठबंधन के घटक राजद ने 71, कांग्रेस ने 24, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा माले) ने 14, भाकपा ने पांच, माकपा और इंडियन इंक्लूसिव पार्टी (आईआईपी) ने तीन-तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किये है। प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज ने प्रथम चरण में 118 उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतारे हैं।
गौरतलब है कि बिहार विधानसभा की 243 सीटों के लिए दो चरण में 06 नवंबर और 11 नवंबर को मतदान कराया जाना है। 14 नवंबर को मतगणना होगी और चुनाव की प्रक्रिया 16 नवंबर तक पूरी हो जायेगी। बिहार विधानसभा का वर्तमान कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहा है।

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बिहार : क्या ख़त्म होगी जाति आधारित राजनीति ? https://demo.theshikshanews.com/bihaar-kya-khatm-hogee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-kya-khatm-hogee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/#respond Mon, 06 Oct 2025 06:03:59 +0000 https://www.khabariya.com/?p=5242 कुमार समीर
जाति आधारित राजनीति के लिए जाने जाने वाले बिहार में यह क्या देखने को मिल रहा है ? क्या यहां जाति आधारित राजनीति ख़त्म होने जा रही है ? इस सवाल को सुनकर आप जरूर आश्चर्यचकित होंगे कि घोर जातिवादी राजनीति करने वाले बिहार में यह क्या संभव है ? एक बार में तो हर किसी का यही ज़वाब होगा कि यह बिल्कुल भी संभव नहीं है। लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार में जातिवाद आधारित राजनीति खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है और इसे शुरू करने वाला और कोई नहीं बल्कि घोर जातिवादी राजनीति करने वाले दल ही हैं। आने वाले कुछ सालों में इसका असर साफ तौर पर दिखाई भी देने लगेगा।
जी हां, बिहार का यह नया रुख पूरे देश में अलख जगाने का काम कर सकता है। इसकी शुरुआत हो चुकी है क्योंकि यहां (बिहार) की राजनीति में पहली बार जाति की जगह क्लास (वर्ग) का महत्व बढ़ता दिख रहा है। सरकारी योजनाओं में महिलाओं, किसानों और पेंशनभोगियों को क्लास के रूप में संबोधित किया जा रहा है। मसलन शिक्षा में मुफ्त योजनाओं की ही बात करें तो दिन का भोजन, साइकिल तथा स्कूल यूनिफॉर्म वितरण में जाति नहीं देखी जा रही है। इसका असर भी दिखने लगा है। छात्रों के विकास को जहां बढ़ावा मिल रहा है वहीं महिलाओं को स्वरोजगार के लिए आर्थिक सहायता भी दी जा रही है।
इस तरह की पहल के बाद कहा जा सकता है कि बिहार में अब ठोस आकार ले रहा है जाति को क्लास (वर्ग) में बदलने का प्रयास। राजनीतिक दलों की घोषणाओं और केंद्र-राज्य सरकार की नीतियों पर गौर करें तो इसका आभास होना शुरू हो जाएगा। हालांकि यह भी सच है कि जाति के क्लास में बदलने के प्रयास का यह प्रारंभिक दौर है। इसलिए जाति और क्लास (वर्ग) -दोनों साथ-साथ चल रहे हैं। जाति का आग्रह जैसे-जैसे कम होगा, वर्ग मजबूत होने लगेगा। यहां सबसे अच्छी बात यह है कि इस बदलाव की पहल सरकार की ओर से हो रही है। वहीं विपक्षी दल भी इसका विरोध नहीं बल्कि अनुसरण ही कर रहे हैं। इसे महिलाओं के मामले में देखें। पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण से शुरुआत हुई जो अब सभी के लिए है।
बिहार की सभी सेवाओं में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत पद आरक्षित कर दिए गए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006-07 में जब बालिकाओं के लिए पोशाक और किताब की योजना शुरू की तो इसमें सबको समाहित किया गया। जाति-धर्म के आधार पर किसी बालिका को इस योजना से बाहर नहीं किया गया। इसका विस्तार बालकों के बीच भी हुआ। फिर साइकिल देने का निर्णय लिया गया। अब तो उन्हें मैट्रिक से लेकर पीजी तक की परीक्षाओं में पास होने पर भी अधिकतम 75 हजार रुपये दिए जा रहे हैं।
शिक्षा से जुड़ी मुफ्त योजनाओं का असर यह हुआ कि बच्चों का विकास छात्र वर्ग के रूप में होने लगा। यूनिफार्म ने बड़ा बदलाव किया। पहले स्कूली बच्चों के पोशाक से ही उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति का पता चलता था। बच्चों के बीच श्रेष्ठता और हीनता का भाव भी पनपता था। 20 वर्ष पहले जिन बच्चों को इस योजना का लाभ मिला, वे आज के युवा हैं। मतदाता भी हैं। हाल-फिलहाल सभी परिवारों की एक महिला को स्वरोजगार के लिए 10 हजार रुपये देने की योजना बनी।
बताते चलें कि घोषणा यह की गई है कि 10 हजार रुपये से सफलतापूर्वक कारोबार प्रारंभ करने वाली महिलाओं को आने वाले दिनों में दो लाख रुपये तक दिए जाएंगे। दिसंबर तक इस योजना के अंतर्गत एक करोड़ 80 लाख महिलाओं को 10-10 हजार रुपये दिए जाएंगे। महिलाएं इस योजना का लाभ एक क्लास (वर्ग) की तरह ले रही हैं। बदलाव यह आया है कि विरोधी दल की ओर से जो घोषणाएं हो रही हैं, उनमें भी महिलाओं के साथ एक क्लास (वर्ग) की तरह व्यवहार किया जा रहा है। इस योजना के दायरे में एक करोड़ 79 लाख महिलाएं हैं।
किसान और पेंशनधारियों को भी एक क्लास (वर्ग) के रूप में आज केंद्र और राज्य सरकार एक क्लास (वर्ग) के रूप में संबोधित कर रही हैं। उन्हें प्रोत्साहन के लिए खाते में राशि भेजी जा रही है। किसान सम्मान निधि के रूप में सभी किसानों के खाते में प्रति वर्ष छह-छह हजार रुपये प्रधानमंत्री की ओर से दिए जा रहे हैं।
किसानों को कृषि यंत्रों के लिए अनुदान दिए जा रहे हैं। अनाजों की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुविधा सभी किसानों को दी जा रही है। सामाजिक सुरक्षा पेंशन देने के मामले में भी जातीय भेद समाप्त किया गया है। यहां भी आर्थिक आधार को रखा गया है।
इतना ही नहीं, आयकर दाता और पहले से किसी योजना के तहत पेंशन पा रहे लोगों को छोड़कर 60 वर्ष और उससे अधिक के नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन की परिधि में ले आया गया है। इसने बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन का आधार दिया है।
सामाजिक सुरक्षा पेंशन पाने वालों की कुल संख्या एक करोड़ 40 लाख से अधिक है। सरकारी सेवाओं में आरक्षण को लेकर समाज के एक हिस्से में बड़ा असंतोष था। जातीय संरचना में ऊंची श्रेणी में रहने के बावजूद गरीबों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता था।
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत आरक्षण का लाभ देकर इस समूह को भी संतुष्ट किया गया है। इसके कारण आरक्षण की सुविधा हासिल करने वाला भी एक अलग क्लास (वर्ग) बन गया है। रोजगार और नौकरी की मांग ऐसी है, जिसकी पूर्ति के लिए युवा एक क्लास (वर्ग) की तरह सड़क पर उतर रहे हैं।
इसे बदलाव की बयार ही कह सकते है कि अब जाति नहीं, गरीबी देखने की बात उठनी शुरू हो गई है। दो वर्ष पहले सभी दलों की पहल पर जाति आधारित गणना हुई। पता चला कि राज्य में 94 लाख से अधिक ऐसे परिवार हैं, जिनकी मासिक आय छह हजार रुपये या उससे कम है।
सरकार ने ऐसे परिवार को कारोबार के लिए दो लाख रुपये देने का नीतिगत निर्णय लिया है। यहां भी जाति के बदले क्लास (वर्ग) को लाभ पहुंचाने के लक्ष्य को देखा जा सकता है। सरकारें पहले भी गरीब कल्याण के लिए योजनाएं चलाती रही हैं, लेकिन वह समाज के सभी गरीबों के लिए नहीं होती थीं। शुरुआत अनुसूचित जाति और जनजाति से होती थी, जो पिछड़े वर्गों तक आकर ठहर जाती थी। उन योजनाओं में लाभ लेने के लिए किसी जाति का होना जरूरी होता था।
समय के साथ इस तरह के बदलाव को हर तबका स्वीकार कर रहा है, यह सबसे बड़ी और सकारात्मक बात है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार और सभी राजनीतिक दल अगर इसी तरह से इस अच्छी पहल का समर्थन करते रहे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब सबका साथ, सबका विकास हर वर्ग, हर समुदाय महसूस करने लगेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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बिहार एसआईआर : 26 दिन में सिर्फ एक पार्टी ने उठाई आपत्ति, अब भी 6 दिन बाकी https://demo.theshikshanews.com/bihaar-esaeeaar-26-din-mein-sirph-ek-paartee-ne-uthaee-aapatti-ab-bhee-6-din-baakee/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-esaeeaar-26-din-mein-sirph-ek-paartee-ne-uthaee-aapatti-ab-bhee-6-din-baakee/#respond Tue, 26 Aug 2025 16:06:59 +0000 http://www.khabariya.com/?p=4865 NCR TODAY. Khabariya. New Delhi। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने के लिए दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया के संबंध में दैनिक बुलेटिन जारी किया है। ईसीआई ने बताया कि 26 दिन बाद सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) की ओर से 10 आपत्तियां मिली हैं।
चुनाव आयोग के मुताबिक, 1 अगस्त 2025 (दोपहर 3 बजे) से 26 अगस्त (सुबह 10 बजे) तक की अवधि में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, दावे और आपत्तियां दर्ज कराने के लिए अब केवल 6 दिन शेष हैं और इन 26 दिनों के दौरान सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्ससिस्ट-लेनिनिस्ट) (लिबरेशन) की तरफ से आपत्तियां मिली हैं, जिनका निपटारा 7 दिन में किया जाएगा।
ईसीआई ने बताया कि 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के नए मतदाताओं से फॉर्म 6 (घोषणा-पत्र सहित) के तहत कुल 4,33,214 आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनका निस्तारण अभी शेष है। साथ ही, योग्य मतदाताओं को शामिल करने और अयोग्य मतदाताओं को हटाने के लिए ईआरओ द्वारा अब तक कोई दावा या आपत्ति प्राप्त नहीं हुई है।
इसके अलावा, मतदाताओं से सीधे प्राप्त दावों और आपत्तियों की संख्या 1,62,453 है, जिनमें से 17,516 का निस्तारण 7 दिनों के बाद किया गया है। नियमों के अनुसार, दावों और आपत्तियों का निस्तारण संबंधित ईआरओ या एआरओ द्वारा पात्रता सत्यापन और 7 दिन की नोटिस अवधि पूर्ण होने के बाद ही किया जाएगा।
1 अगस्त 2025 को प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूची से किसी भी नाम को बिना जांच और उचित अवसर दिए हटाया नहीं जा सकता। इसके लिए स्पष्ट आदेश पारित करना अनिवार्य है। प्रारूप मतदाता सूची में शामिल न किए गए नामों की सूची (कारण सहित) जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ/डीएम) और मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी की वेबसाइट पर ईपीआईसी नंबर के साथ खोज योग्य रूप में उपलब्ध है। असंतुष्ट व्यक्ति आधार कार्ड की प्रति के साथ अपने दावे प्रस्तुत कर सकते हैं।

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