dominate – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com ( A Unit OF NCR Today News Paper Group ) Sat, 15 Nov 2025 15:35:43 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=6.9.1 https://demo.theshikshanews.com/wp-content/uploads/2025/05/cropped-Khabariya-Logo-Samal-32x32.jpg dominate – खबरिया.com https://demo.theshikshanews.com 32 32 बिहार विधानसभा में धनकुबेरों का दबदबा, करोड़पति है 90 फीसदी विजयी प्रत्याशी https://demo.theshikshanews.com/bihaar-vidhaanasabha-mein-dhanakuberon-ka-dabadaba-karodapati-hai-90-pheesadee-vijayee-pratyaashee/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-vidhaanasabha-mein-dhanakuberon-ka-dabadaba-karodapati-hai-90-pheesadee-vijayee-pratyaashee/#respond Sat, 15 Nov 2025 15:35:43 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5794 NCR TODAY. Khabariya. Webvarta. Patna। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद उम्मीदवारों की आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक प्रोफ़ाइल पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार, इस बार चुनकर आये 243 में से 90 प्रतिशत विजयी प्रत्याशी करोड़पति हैं, जिनकी औसत संपत्ति 9.02 करोड़ रुपये आंकी गई है।
इससे स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति में धनबल की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश दलों के उम्मीदवारों की संपत्ति करोड़ों में है। करोड़पति विजयी प्रत्याशियों की इतनी बड़ी संख्या यह दर्शाती है कि आर्थिक रूप से सशक्त उम्मीदवारों की चुनावी राजनीति में पकड़ मजबूत होती जा रही है।
उधर विजयी प्रत्याशियों की शैक्षिक योग्यता भी दिलचस्प तस्वीर पेश करती है। कुल विजयी प्रत्याशियों में से 35 प्रतिशत 5वीं से 12वीं तक शिक्षित हैं। स्नातक और उससे ऊपर की शैक्षणिक योग्यता रखने वाले 60 प्रतिशत उम्मीदवार हैं। वहीं डिप्लोमा धारक विजयी प्रत्याशियों की संख्या पांच है और केवल साक्षर विजयी उम्मीदवारों की संख्या सात है।
यह आंकड़ा दर्शाता है कि उच्च शिक्षित उम्मीदवारों का दबदबा तो है, लेकिन सीमित शिक्षा वाले प्रत्याशी भी पर्याप्त संख्या में जीत दर्ज कर रहे हैं।
वहीं उम्मीदवारों की आयु सीमा के आधार पर विधानसभा की तस्वीर कुछ इस प्रकार है। 25 से 40 वर्ष आयुवर्ग के विजयी प्रत्याशियों की संख्या 38 (16 प्रतिशत) है। 41 से 60 वर्ष के बीच आयुवर्ग के कुल 143 (59 प्रतिशत) विजयी उम्मीदवार हैं और 61 से 80 वर्ष के बीच आयु वर्ग वाले विजयी प्रत्याशियों की संख्या 62 (26 प्रतिशत) है।
आंकड़ों से जाहिर होता है कि बिहार विधानसभा में सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व मध्यम आयु वर्ग के नेताओं का है, जबकि युवा नेतृत्व की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है।
वहीं, 243 विजेताओं में से 12 प्रतिशत यानी 29 महिलायें इस बार विधानसभा पहुंची हैं। पिछली बार यह आंकड़ा 11 प्रतिशत था। हालांकि, इस बार महिला प्रतिनिधित्व में वृद्धि मामूली है, लेकिन महिलाओं की उपस्थिति में निरंतर वृद्धि उम्मीद की किरण दिखाती है।

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बिहार चुनाव में इसबार भी हावी रहेगी जाति आधारित राजनीति https://demo.theshikshanews.com/bihaar-chunaav-mein-isabaar-bhee-haavee-rahegee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/ https://demo.theshikshanews.com/bihaar-chunaav-mein-isabaar-bhee-haavee-rahegee-jaati-aadhaarit-raajaneeti/#respond Wed, 15 Oct 2025 14:57:53 +0000 http://www.khabariya.com/?p=5359 इंद्र शेखर शाह/लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए बिगुल बजते ही प्रदेश के दो प्रमुख गठबंधनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और राष्ट्रीय जनता दल नीति महागठबंधन के साथ ही बिहार से राजनीति की शुरूआत कर रही जन सुराज पार्टी अपने अपने मुद्दों को लेकर लोगों के बीच पहुंच चुकी है तथा ये मुद्दे बिहार चुनाव को गर्म और जटिल बनाए हुए हैं। बेरोजगारी और पलायन युवाओं को प्रभावित कर रहे, जबकि जाति और वोटर लिस्ट विवाद पारंपरिक वोट बैंकों को प्रभावित कर सकते हैं। राजग “विकास” और “सुशासन” पर जोर दे रही, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) “ सामाजिक न्याय” और “नौकरी” के वादे पर जोर दे रहा जबकि जन सुराज नया विकल्प बनने की कोशिश में है। बिहार के लिए सबसे बड़े पर्व छठ पूजा के बाद 6 और 11 नवंबर की वोटिंग में टर्नआउट और ग्राउंड मूड निर्णायक होगा।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कई प्रमुख मुद्दे मतदाताओं और राजनीतिक दलों के बीच चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। ये मुद्दे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों से जुड़े हैं और बिहार की ग्राउंड रियलिटी को दर्शाते हैं। बिहार में बेरोजगारी एक दीर्घकालिक और गंभीर है। 2023-24 के डेटा के अनुसार, बिहार में बेरोजगारी दर 6.8 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत (3.2 प्रतिशत) से दोगुनी है। युवा (15-29 आयु वर्ग) में बेरोजगारी 13-15 प्रतिशत तक है। इसके परिणामस्वरूप, लगभग 75 लाख बिहारी प्रवासी मजदूर दिल्ली, मुंबई, पंजाब और अन्य राज्यों में काम कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार बिहार की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे है, जो रोजगार की कमी को और उजागर करता है।
राजद ने हर परिवार में एक नौकरी देने का वायदा किया है जो 2020 के उसके “10 लाख सरकारी नौकरी” के वादे का विस्तार है। युवा वोटर इस वादे को लेकर उत्साहित दिखते हैं, लेकिन इसे अव्यवहारिक भी कहते हैं क्योंकि इसके लिए लाखों करोड़ रुपये की जरूरत होगी जबकि बिहार का बजट ही तीन लाख करोड़ रुपये का है। इसके लिए वित्त पोषण कहां से किया जायेगा इसका कोई उल्लेख कहीं नहीं है। बिहार में बड़े पैमाने पर औद्योगिकीकरण के बगैर सरकार राजस्व नहीं बढ़ा पायेगी। ऐसी स्थिति में इस तरह के वादे अव्यवहारिक ही है।
वहीं बिहार की नीतीश कुमार की सरकार दावा करती है कि 5 लाख सरकारी नौकरियां दी गईं और बिहार में औद्योगिक निवेश बढ़ा। हालांकि लोगों का कहना है कि “नौकरियां केवल कागज पर हैं” और ठोस औद्योगिक विकास नहीं हुआ। चुनाव प्रबंधक से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने बेरोजगारी को “बिहार की सबसे बड़ी बीमारी” कहा है और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार और स्टार्टअप को बढ़ावा देने का वादा किया है। उनकी रैलियों में युवा भीड़ दिख रही है लेकिन ये भीड़ वोट में तब्दील होने पर ही जन सुराज पार्टी कोई बदलाव करने की स्थिति में होगी। हालाँकि अब तक जो रूख दिख रहा है उसमें जन सुराज पार्टी के भी बड़े पैमाने पर उलट फेर करने में सफल रहने की संभावना बहुत कम है। हालांकि बेरोजगारी को लेकर युवा वोटरों में कुछ नाराजगी दिख रही है लेकिन प्रधानमंत्रर नरेन्द्र मोदी के कारण राजग की स्थिति अभी तक बेहतर है।
बिहार की राजनीति में जाति एक केंद्रीय कारक है। 2023 की बिहार जाति जनगणना के अनुसार, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईबीसी) 36 प्रतिशत, ओबीसी 27 प्रतिशत, यादव 14 प्रतिशत और दलित 19 प्रतिशत मुख्य वोट बैंक हैं। ऊपरी जातियां भूमिहार और राजपूत 10 प्रतिशत हैं जबकि मुस्लिम 17 प्रतिशत हैं। राजद यादव और मुस्लिम समीकरण पर निर्भर। तेजस्वी यादव ने ईबीसी और दलितों को लुभाने के लिए “सामाजिक न्याय” और आरक्षण बढ़ाने की बात कही है।
राजग के नेतृत्वकर्ता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ईबीसी और कुर्मी आधार मजबूत है। उनकी “लव-कुश” (कुर्मी-कोइरी) रणनीति और ईबीसी को विशेष पैकेज देना वोटरों को आकर्षित कर रहा। भाजपा पी: ऊपरी जातियों और गैर-यादव ओबीसी पर फोकस कर रही है जबकि प्रशांत किशोर ने “जाति-मुक्त राजनीति” की बात कही है, लेकिन उनकी रैलियों में ईबीसी और ऊपरी जातियों की भागीदारी ज्यादा दिख रही।राजग विशेषकर भाजपा बिहार चुनाव को सुशासन बनाम जंगलराज बनाने की पूरी कोशिश कर रही है।इसके लिए नीतिश कुमार के कार्यकाल को सुशासन और विकास वाला बताया जा रहा है।
लेखक बिहार के मतदाता हैं और वरिष्ठ पत्रकार हैं

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